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पाक से बेघर आए, तिरस्कृत मगर विलक्षण हाथ थे; आज हैंडीक्राफ्ट से संवार रहे दुनिया

जोधपुर की पहचान लकड़ी का हैंडीक्राफ्ट| 800 करोड़ का कारोबार पाक विस्थापितों पर निर्भर

भंवर जांगिड़ | Last Modified - Jan 22, 2018, 06:45 AM IST

पाक से बेघर आए, तिरस्कृत मगर विलक्षण हाथ थे; आज हैंडीक्राफ्ट से संवार रहे दुनिया

जोधपुर. भारत-पाक के हमेशा से तनावपूर्ण रिश्तों में सबसे ज्यादा प्रताड़ित हुए तो वे पाकिस्तानी हिंदू थे। बंटवारे के बाद 1951 में पहली जनगणना हुई तो भारत की पश्चिमी सीमा पर हिंदुओं की आबादी 15 प्रतिशत थी जो अब 1.6 पर पहुंच गई है। यानी हजारों की संख्या में विस्थापितों ने अपना घर-बार बेच कर अथवा लुटा कर भारत की ओर रुख कर लिया। ऐसे ही हजारों विस्थापित जोधपुर संभाग में भी आए और यहीं पर नई जिंदगी की शुरूआत की। विषम हालात और शरणार्थी के रूप में तो आए थे, मगर उनके हाथों में विलक्षण प्रतिभाएं थी। पहली बार 1971 की लड़ाई से विस्थापित होकर आने वालों ने जोधपुर में लकड़ी के हैंडीक्राफ्ट का काम शुरू किया, यह वह समय था जब हैंडीक्राफ्ट जोधपुर में जन्म ले रहा था। आज वही हैंडीक्राफ्ट 2000 करोड़ के निर्यात तक पहुंच गया और जोधपुर की दुनिया में पहचान भी इसी के पीछे होने लगी है। आपको आश्चर्य होगा कि इस पहचान के पीछे 15000 विस्थापित शिल्पकारों की मेहनत है जिन्होंने 40 फीसदी यानी 800 करोड़ के लकड़ी हैंडीक्राफ्ट निर्यात को अपने पर निर्भर कर रखा है। इनमें से 75 प्रतिशत शिल्पकार लकड़ी के अनफिनिश्ड उत्पाद बना रहे हैंं और 25 प्रतिशत पॉलिश, फिनिशिंग, मेटल-बोन व पेंटिंग के काम करते हैं।


विलक्षण होने के बावजूद ये हाथ अभी तक तिरस्कृत हैं, निर्यातक नहीं बन पाए, क्यों? एक विस्थापित उद्यमी औसत 8000 क्यूबिक फुट काम करता है जो लगभग 9 मिलियन टर्नओवर के बराबर है। फिर भी 50 फीसदी उद्यमी पैसा नहीं हाेने के कारण मशीनों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे 70 फीसदी लोग निर्यातकों के सप्लायर होकर रह गए। उनका पैसा समय पर नहीं मिलता और हमेशा जूझते रहते हैं। अधिकांश सप्लायर रोकड़ नहीं होने के कारण उधारी में लकड़ी व हार्डवेयर लाते हैं जो 5 प्रतिशत महंगा भी पड़ता है जबकि इस काम में उनका मुनाफा भी महज 7 से 9 प्रतिशत से भी कम है। ऐसे ही एक शिल्पकार रोजाना 10 घंटे काम कर औसत 600 रुपए कमा पाता है। एक फैक्ट्री में वह करीब 7 साल काम करता है तो 11 प्रतिशत पीठ दर्द के शिकार हो जाते हैं, 9 फीसदी को सांस की तकलीफ 8 फीसदी आंखों की कमजोरी और इतने ही कोई न कोई विकलांगता के शिकार हो जाते हैं। इन सभी कठिन परिस्थितियों के साथ उन्हें दो-तीन दशक तक नागरिकता व घर बसाने का कड़ा संघर्ष भी करना पड़ा जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति कभी सुधर ही नहीं पाई। उधर जोधपुरी हैंडीक्राफ्ट दुनिया भर में छाने लगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हस्तशिल्प के उत्पाद का वार्षिक निर्यात हर साल 10 प्रतिशत बढ़ रहा है। भारत में हैंडीक्राफ्ट फर्नीचर की वार्षिक मांग भी 15 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रही है। राजस्थान के 50 लाख परिवारों यानी आबादी का 9 फीसदी की आजीविका को सहारा दे रहा है। ईपीसीएच व फाउंडेशन फॉर एमएसएमई क्लस्टर के सर्वे के इन आंकड़ों में यह भी बताया गया है कि जोधपुर में लगभग 700 निर्यातक हैं और लकड़ी के हैंडीक्राफ्ट का 60 फीसदी कारोबार सिर्फ 5 प्रतिशत निर्यातकों पर ही निर्भर करता है।


जेठानंद बिजानी, महेशाराम जेमानी और भवानी ब्रदर्स ऐसे विस्थापितों के नाम है जो 71 में भारत आए थे और शिल्पकार थे इसलिए मजदूरी कर पेट पालने लगे। फिर दस-पंद्रह जनों को जोड़ कर छोटे सप्लायर बने और 76 में तीनों ने निर्यात शुरू कर दिया। नब्बे के दशक में ये तीनों उन चुनिंदा एक्सपोर्टर में शामिल थे जिनका टर्नओवर सबसे ज्यादा था। इन्होंने कई विस्थापितों को रोजगार दिया, उसे आगे बढ़ाया गुमानाराम व सरदाराराम ने। गुमानाराम ने यहीं से ग्रेज्युएशन की डिग्री की जबकि सरदाराराम पहले से इंजीनियर थे। सरदाराराम ने छोटी परचून की दुकान खोली जो चली नहीं, वे थे तो शिल्पकार, दुकानदार तो थे नहीं। इसलिए हैंडीक्राफ्ट में उतर गए और 2000 से अपना निर्यात शुरू कर दिया। बस इतने ही गिने-चुने नाम है, बाकी तो अभी भी मजदूरी कर रहे हैं। युनिवर्सल जस्ट एंड एक्शन सोसायटी और राजस्थान उद्योग विभाग ने एक साल पहले एक अध्ययन कर विस्थापित वर्ग के लघु उद्यमियों व दस्तकारों के कारोबार की प्रगति व विकास में योगदान पर संपूर्ण तस्वीर खींचने का प्रयास किया था। जिसमें उनकी क्षमता, सफलता, समस्याओं व चुनौतियों को उकेरा था, मगर वह किताबी सूरत में ही दस्तयाब होकर रह गया। विस्थापित परिवार के लिए काम करने वाले सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदूसिंह सोढ़ा अब इन शिल्पकारों व दस्तकारों को संगठित कर रहे हैं। उनके लिए क्लस्टर विकास योजना शुरू की है। ताकि इन विलक्षण हाथों को ठोस मंच व व्यावहारिक बाजार उपलब्ध करा सके। लघु उद्यमियों व शिल्पकारों को स्वयं सहायता समूहों में जोड़ कर उनके प्रशिक्षण, डिजाइनिंग और वैश्विक बाजार पर पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयास हो रहे हैं।

- 15000 शिल्पकार हैं विस्थापित परिवारों के

- 20% कॉन्ट्रेक्टर हैं इन परिवारों में से
- 47% स्किल्ड
- 20% सेमी स्किल्ड शिल्पकार

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Web Title: paak se beghr aaye, tirskrit mgar vilksn haath the; aaj haindikraaft se snvaar rahe duniyaa
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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