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बचपन से मांसपेशियां टूटने के कारण खड़े नहीं हो पाते, अब खुद का बैंड बनाएंगे

डिसएबल | असाध्य बीमारियों के बावजूद संगीत व शिक्षा के क्षेत्र में सफल इन होनहारों से सीखें जीना

Dainik Bhaskar

Mar 05, 2018, 06:12 AM IST
डिसएबिलिटी फिजिकल होती है मेंटली नहीं, मैं बहुत स्ट्राॅग हूं’  - सुधांशु व्यास डिसएबिलिटी फिजिकल होती है मेंटली नहीं, मैं बहुत स्ट्राॅग हूं’ - सुधांशु व्यास

जोधपुर. अनुवांशिक बीमारी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से लड़ रहे ये सुधांशु व्यास हैं। बचपन से मांसपेशियां टूटने के कारण 9 साल से व्हीलचेयर पर है। पीठ झुकने के साथ फेफड़े इतने मुड़ चुके है कि श्वास लेने में भी मुश्किल आती है। इसी बीमारी से बड़े भाई मनीष की 21 साल की उम्र में मृत्यु हो चुकी है, लेकिन सुधांशु अपनी संगीत साधना के दम पर इन सारी चुनौतियों को मात दे रहे हैं। अपने कई वीडियो-ऑडियो रिकॉर्ड कर चुके सुधांशु जब ख्याल, गजल, राग-रागिनी, बंदिश के साथ फिल्म व अंग्रेजी गानों पर अपने सुर लगाते हैं तो श्रोता मुग्ध हो जाते हैं। लगन के इतने पक्के कि कठिन सुर को तब तक नहीं छोड़ते जब तक कि उसमें निपुण ना हो जाए।

- 2 साल से महाराष्ट्र के गंधर्व महाविद्यालय से संगीत सीख ने सुधांशु का पहला वीडियो ए मेरे प्यारे वतन... काफी सराहा गया। अब वे अपना बैंड बनाने में जुटे हैं। कुछ समय पहले टाउन हॉल में उन्होंने सरोद वादक अमजद अली खां के सामने पायलिया छनकार... बंदिश सुनाई तो वे इतने मोहित हो गए कि माला पहना कर अभिवादन कर कहा कि तुम बड़े सिंगर बनोगे।

- सुधांशु कंप्यूटर पर गाने सुन कर इलेक्ट्रिक तानपुरा व वायरलेस माइक पर प्रैक्टिस करते हैं। बड़ी मां व पैरेंट्स उनके हाथ माउस पर जमाते और की-बोर्ड पर कहे अनुसार टाइप करते हैं।

- हाईकोर्ट में क्लर्क पिता अरविंद व्यास बताते हैं कि डॉक्टर्स के अनुसार ऐसी बीमारी से पीडितों की उम्र 22-23 साल से ज्यादा नहीं होती, लेकिन सुधांशु अपने पैशन से इस बीमारी को मात दे रहे हैं।

लोग मुझे मेरी डिसएबिलिटी नहीं बल्कि अचीवमेंट्स से जानें’  - हर्षिता पारख लोग मुझे मेरी डिसएबिलिटी नहीं बल्कि अचीवमेंट्स से जानें’ - हर्षिता पारख

हाथ-पैर नहीं मुड़ते थे, 17 साल में 25 ऑपरेशन, हौसले से सीबीएसई के नेशनल टैलेंट सर्च में जोधपुर टॉपर रहीं



- हर्षिता पारख बचपन से अॉर्थ्रोग्रेपोसिस मल्टीप्लेक्स कंजेनिशा नामक दुर्लभ बीमारी से संघर्ष कर रही हैं। इस बीमारी से पीडितों के बॉडी जॉइंट्स काम नहीं करते। इस कारण हाथ-पैर मुड़ने  के साथ ही चलना-फिरना और उठना-बैठना नहीं हो पाता। हर्षिता के साथ भी ऐसा ही हुआ।

 

- एकबारगी तो माता-पिता टूट चुके थे, लेकिन जल्द को खुद को संभाल बेटी का बेहतर से बेहतर इलाज करवाने की ठानी। छह माह से लेकर 17 साल तक की उम्र तक हर्षिता के 25 ऑपरेशन हुए। लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी।

 

- मोटिवेशनल स्पीकर निक वुजिसिक को अपना आइडल मनाने वाली हर्षिता का इतने ऑपरेशन के बाद भी पहाड़ा सा हौसला ऐसा था कि कभी चेहरे पर निराशा नहीं आने दी। परिणाम यह रहा कि बढ़ती उम्र के साथ वो चलने-फिरने व उठने-बैठने में समक्ष होने लगी।

 

- दिल्ली पब्लिक स्कूल की 10वीं की स्टूडेंट हर्षिता ने लंबे इलाज के बावजूद पढ़ाई से समझौता नहीं किया। हाल ही में उसने सीबीएसई के नेशनल टेलेंट सर्च एग्जाम के फ़र्स्ट स्टेज में पूरे जोधपुर में टॉप किया है। उसने कई कविताएं व आर्टिकल भी लिखे हैं।

 

- अपने आर्टिकल “हाउ आई डेवलप्ड माय सेल्फ टू फेस द चैलेंजेज’ में उसने अपने संघर्ष को बयां किया, जिसे खूब सराहा गया।

- हर्षिता को सिंगिंग का भी शौक है। मां गीता पारख बताती हैं कि जिंदगी ने हर्षिता को हार मानने की कई वजह दी, लेकिन उसने हमेशा हौसले को चुना। वो दौर बहुत मुश्किल था लेकिन उसके टीचर्स व क्लास मेट्स ने उसे हमेशा सपोर्ट किया।

 

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