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926 करोड़ की डकैती विफल करने वाले सिपाही की कहानी

3 वर्ष पहले
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सीताराम स्कूल के दिनों में पिता के साथ करते थे मजदूरी।

माता-पिता मजदूर, खुद बीएड हैं- टीचर बनना चाहते थे, पहली ही पोस्टिंग में ये कारनामा

मदन कलाल | जयपुर

सीताराम 28 जनवरी को ड्यूटी पर थे। वे एक्सिस बैंक में तैनात हैं। उस दिन डीओ सुरेंद्र सिंह ने इंस्पेक्शन के दौरान उन्हें राइफल दिखाने को कहा तो सीताराम ठीक से राइफल को एक्शन में नहीं ले सके। डीओ ने जोरदार फटकार लगाई। इस पर सीताराम खुद दुखी हो गए, लेकिन ठान लिया कि आज से अलर्ट ही रहूंगा। वे कहते हैं कि उस फटकार का ही असर था कि 10 दिन बाद इतनी मुस्तैदी से डकैतों पर खिड़की से एट ए ग्लांस फायर करने में कामयाब हुआ। 926 करोड़ की देश की सबसे बड़ी डकैती को बीते मंगलवार नाकाम करने वाले सीताराम को गेलैंट्री प्रमोशन देने की सिफारिश की गई है।

उस दिन सी-स्कीम स्थित बैंक के बाहरी हिस्से में गेट पर निजी सुरक्षा गार्ड प्रमोद कुमार तैनात थे। रात ढाई बजे की बात है। एक इनोवा में सवार होकर 13 बदमाश बैंक पहुंचे। दो गाड़ी में ही बैठे रहे, जबकि पांच-छह नकाबपोश बदमाश बाहरी दीवार फांदकर परिसर में घुस आए। दो के हाथ में पिस्तौल थी। दो ने प्रमोद पर हमला कर दिया। उसके हाथ-पैर बांधने लगे। बाकियों ने बैंक का चैनल गेट खोल लिया। बाहर हल्ला सुनकर बैंक की तिजोरी की सुरक्षा में तैनात सीताराम ने तुरंत स्थिति समझ ली और फायर कर दिया। दूसरे फायर के लिए निशाना साधा ही था कि बदमाश घबराकर भागने लगे। बदमाश डकैती की पूरी योजना से आए थे। इस कारनामे से पुलिस विभाग में हीरो बने सीताराम से भास्कर ने बात की। उन्होंने बताया- सचमुच वो काफी डरावना पल था, लेकिन अब मुझे आगे के लिए और हिम्मत मिल गई है। मेरे लिए इस नौकरी तक पहुंचना आसान नहीं रहा। मां-बाप पढ़-लिख नहीं सके थे। मजदूरी करते हैं। मैं इकलौती संतान हूं। मजदूरी-खेती में पिता का हाथ बंटाते हुए कॉपी-किताबों का इंतजाम किया। बीएड कर टीचर बनना चाहता था, लेकिन काॅन्स्टेबल भर्ती में चुन लिया गया तो इस अलग ही राह पर आ गया। प्रोबेशन पीरियड खत्म होने के बाद यह पहली ही पोस्टिंग है।

मूल रूप से सीताराम सीकर के पूनियाणा गांव के हैं। सीनियर सेकंडरी तक की पढ़ाई दांतारामगढ़ से की तो कॉलेज रेनवाल से। बारहवीं में क्लास टाॅपर रहे। शेष | पेज 10 पर

डेढ़ साल पहले ही शाादी हुई है। वे बताते हैं- घटना के बारे में जब घर पर पता चला तो, बापू टोडाराम ने पहली बार शाबासी दी। कहा, बेटा तूने नाम कर दिया है। आज हर किसी की जुबां पर तुम्हारे चर्चे हो रहे हैं। मां प्रेम को भी बेटे पर गर्व है। हालांकि अनहोनी की आशंका से वे डर भी जाती हैं और बेटे को संभलकर रहने को कहती हैं। प|ी काे आस है कि वे महकमे में इसी मुस्तैदी के साथ काम करते रहेंगे। सीताराम बताते हैं- गांव में आज भी टीचर बनना सबसे बड़ा सपना होता है। मां-बाप की भी ख्वाहिश यही थी कि बेटा टीचर बन जाए। बीएड करने के साथ ही टीचर बनने की तैयारी शुरू की ही थी कि काॅन्स्टेबल भर्ती में चयन हो गया। 2015 में नौकरी ज्वाइन की। प्राेबेशन पूरा होने के बाद यहां बैंक की चेस्ट शाखा की सुरक्षा में तैनात कर दिया गया।

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