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लुप्त होती मारवाड़ी गेर

सिटी रिपोर्टर. जोधपुर| आन बान शान की संस्कृति से जुड़ा मारवाड़ में महाराजा मानसिंह के शासनकाल में संगीत की परंपरा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 03:15 AM IST

लुप्त होती मारवाड़ी गेर
सिटी रिपोर्टर. जोधपुर| आन बान शान की संस्कृति से जुड़ा मारवाड़ में महाराजा मानसिंह के शासनकाल में संगीत की परंपरा से इसकी शान में एक ओर नगीना जुड़ा जो आज दिन तक कायम है। संगीत के कारण ही मानसिंह के शासन काल को रसिया राज के नाम से पुकारा जाने लगा। उनकी ओर से शुरू की गई श्लील गाली गायन परंपरा को शहरवासी आज तक निभाते आ रहे हैं। गायकी की इस परंपरा को आगे बढ़ाने में यूं तो कई नाम है, मगर जिन्होंने अपनी खास पहचान कायम की उनमें स्व. आत्माराम रामदेव आतूजी, स्व.दाउलाल रामदेव,स्व. मदन मस्ताना, माईदास थानवी, एसएन व्यास मूलसा, दिनेश नरेश बोहरा, कृपाकिशन भासा इस परंपरा को आगे बढ़ाने में बरसों तक गायन किया। इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए युवा भी आगे आ रहे हैं। मगर पिछले कुछ वर्षों से गेर खर्च बढ़ने के कारण गायकों की संख्या घटने लगी तो करीब 25 साल बाद फिर से इस होली पर मूलसा ने मोर्चा संभाला और इस परंपरा को जिंदा रखने व आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को जोश दिलाया। नई पीढ़ी में गोविंद फाग के युवाओं ने कई सालों तक माईदास थानवी के स्तर तक गायकी से अपनी पहचान बनाई। इसके बाद अवीन केवलिया, मनोज बेली में से इस साल केवल ललित मत्तड़ ही रह गए।

महाराजा मानसिंह के शासनकाल से शुरू हुई थी श्लील गायन की परंपरा

जोधपुर में श्लील गाली गायन अपनी खास पहचान बनाए हुए है। मैने इस परंपरा को करीब 75 साल तक निभाए रखा अब उम्र ज्यादा होने से विराम लेना पड़ा। यह परंपरा रुकनी नहीं चाहिए युवाओं को आगे आकर भीतरी शहर की इस परंपरा को कायम रखना जरुरी है।

माईदास थानवी

श्लील गाली गायन परंपरा को जिंदा रखने के लिए मैने 25 साल बाद फिर से एकबार गायकी का मोर्चा संभाला। इसके पीछे एक ही मकसद कि यह परंपरा खत्म नहीं होनी चाहिए। हालांकि युवा आगे आ रहे हैं,मगर एक दो साल बाद मैदान छोड़ देते हैं। जबकि ये लंबी पारी का गेम है,जिसे कायम रखना होगा।

- एसएन व्यास मूलसा

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Web Title: लुप्त होती मारवाड़ी गेर
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