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लोगों से उलझने की बजाय पहले खुद से सुलझ लेना चाहिए : डॉ. पदमचंद्र

News - कम्युनिटी रिपोर्टर | जोधपुर जैन संत डॉ. पदमचंद्र महाराज ने कहा, कि साधक को सहज जीवन जीना चाहिए। लोगों से उलझने की...

Dainik Bhaskar

Apr 01, 2018, 03:50 AM IST
लोगों से उलझने की बजाय पहले खुद से सुलझ लेना चाहिए : डॉ. पदमचंद्र
कम्युनिटी रिपोर्टर | जोधपुर

जैन संत डॉ. पदमचंद्र महाराज ने कहा, कि साधक को सहज जीवन जीना चाहिए। लोगों से उलझने की बजाय खुद से पहले सुलझ लेना चाहिए। वाणी और वचन का समन्वय कर हम सुलझा हुआ जीवन जी सकते हैं। वे शनिवार को लक्ष्मीनगर में धर्मसभा को संबाेधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा, कि सुलझा हुआ जीवन जीने से मोह और मिथ्या से बचकर जीव सम्यकत्व के सोपान चढ़कर सद‌्गति प्राप्त कर सकता है। ‌उन्होंने कहा, कि उलझन बाहर से नहीं भीतर से प्रकट होती है। क्रोधी व्यक्ति को अच्छी से अच्छी वस्तु दे दी जाए, मगर उसे बेकार ही नजर आएगी। शीतल जल देने पर भी उसे उबलता हुआ लगेगा, क्योंकि क्रोध उबाल और शीतलता महसूस नहीं होने देता। उन्होंने कहा, कि भगवान महावीर से वाणी का संयम सीखा जा सकता है। अपने पर संयम रखो। संयम से सम्यकत्व की ओर बढ़ सकते हैं। सम्यकत्व ही अमृत है। अमृत का पान करने वाले व्यक्ति पर हलाहल का प्रभाव नहीं पड़ता। शनिवार को डेढ़ सौ से अधिक आयंबिल हुए। तपस्वियों ने श्रद्धापूर्वक आराधना की।

संत ने लक्ष्मीनगर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए वाणी और वचन के तालमेल पर जोर दिया

जैन समाज के लोग आयंबिल आराधना में शामिल हुए।

दौलत और शोहरत के पहाड़ खड़े कर लें, यदि भीतर से प्रसन्न नहीं तो हर सफलता अधूरी : संबुद्ध सागर

जोधपुर| जैन मुनि संबुद्ध सागर ने कहा, कि मुस्कुराहट ही जिंदगी की सबसे ऊंची उपलब्धि है। मुस्कुराहट के दम पर ही टूटे हुए रिश्तों में नई जान फूंकी जा सकती है। दौलत और शोहरत के पहाड़ खड़े कर लिए जाएं, यदि भीतर से व्यक्ति प्रसन्न नहीं हैं तो हर सफलता अधूरी है। वे शनिवार को रेलवे स्टेशन स्थित दिगंबर जैन मंदिर में साधकों का मार्गदर्शन कर रहे थे। उन्होंने कहा, कि भीतर की खुशी ही धर्म से मिलने वाली सबसे बड़ी दौलत है। जो अपने बुजुर्गों का सम्मान करता है वो सारी दुनिया से सम्मान पाता है। जो अपने माता-पिता को प्यार से सुनता है, उसकी आवाज सारी दुनिया सुनती है। यदि किसी के दिल में घर बनाना है तो उसे अपने कानों में घर बनाने दो। जिसको दिल से सुनते हैं, वो अपना बन जाता है। यदि किसी को सुना न जाए तो यह बोलने वाले की सबसे बड़ी बेइज्जती है। मुनि संबुद्ध सागर और मुनि सक्षम सागर उदयपुर से रवाना होकर विभिन्न गांवों से होते हुए तीन सौ से ज्यादा किलोमीटर चलते हुए जोधपुर पहुंचे हैं।

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