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होली पर्व पर परंपराओं में इतनी विविधता सिर्फ मारवाड़ में

बिलाड़ा से 25 किमी दूर हुण गांव में एक बार गांव से निकल रही मुगल सेना के डर से लोग शुभ मुहूर्त के समय दूसरे गांवों में...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 05:35 AM IST
बिलाड़ा से 25 किमी दूर हुण गांव में एक बार गांव से निकल रही मुगल सेना के डर से लोग शुभ मुहूर्त के समय दूसरे गांवों में चले गए और मुहूर्त में रोपे गए डांडे का दहन नहीं कर पाए। वे वापस आए तब तक डांडा अंकुरित होकर हरा-भरा हो गया। तब से गांव में दहन नहीं करने की परंपरा है।

जोधपुर: श्लील गायन से मनुहार

भीतरी मोहल्लों में सगे-सगियों की मनुहार के लिए श्लील गायन की परंपरा है। नवचौकिया में मंडलेश्वर फाग व अन्य गेर दलों की ओर से, तो बनियाबाड़ा में मधुर फाग के गायक मूलसा की ओर से श्लील गायन किया जाएगा।

लोहावट: ज्वाला नहीं देखते विश्नोई

लोहावट में विश्नोई समुदाय होलिका दहन की ज्वाला नहीं देखता। विश्नोई भक्त प्रहलाद के अनुयायी हैं। वे दहन के दिन न उत्सव मनाते हैं, ना ही व्यंजन बनाते हैं। दूसरे दिन प्रहलाद के बचने की खुशी में शब्दवाणी का पाठ कर पाहल बनाते हैं, रंग लगा मिठाई खिलाते हैं।

बिलाड़ा: हुण गांव में मुगल काल से नहीं किया जा रहा दहन

भीनमाल: युवाओं व बुजुर्गों के सामंजस्य का संदेश है घोटा गेर

भीनमाल में युवा और बुजुर्ग साफा पहने और हाथ में लाठी लेकर एक साथ गेर निकालते हैं। विभिन्न गली-मोहल्लों के युवा-बुजुर्ग एक चौराहे पर एकत्रित होकर सामूहिक गेर नृत्य करते हुए चंडीनाथ मंदिर जाते हैं। वहां पूजा-अर्चना कर गेर बड़े चोहटे के लिए रवाना होती है।

आहोर: मुगल सेना को खदेड़ने की तरकीब बनी त्योहार, अब बंद

आहोर में होली पर भाटा गेर आयोजित होती थी, जिसमें दो दलों के बीच मोटी कांटेदार दीवार बना एक-दूसरे पर पत्थर फेंके जाते थे। विजयी दल की ओर से भोज दिया जाता था। बुजुर्गों के अनुसार मुगल सैनिकों को खदेड़ने की यह तरकीब त्योहार बन गई, अब कोर्ट के आदेश से बंद है।