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खाने का ऐसा लगा चस्का

खाने का ऐसा लगा चस्का

SUNIL CHOUDHARY | Last Modified - Jan 09, 2018, 05:05 PM IST

जोधपुर। शिकार करने में माहिर बाज हजारों प्रवासी पक्षियों पर भारी पड़ रहा है। जोधपुर जिले के खींचन कस्बे में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर पहुंची साइबेरियन बर्ड कुरजां की संख्या यकायक कम हो गई है। क्षेत्र में दो बाज के लगातार हमलों से त्रस्त हजारों कुरजां ने यहां से पलायन कर दिया है। बड़े आकार के स्पॉडेट ईगल के हमलों के कारण इनकी संख्या 18 हजार से कम होकर महज कुछ सौ तक सीमित हो गई है। बहुत घातक शिकारी है स्पॉडेट ईगल…

- सर्दी के दिनों में खींचन कस्बा हमेशा कुरजां के कलरव से गुंजायमान रहता है। यहां हर साल हजारों की संख्या में साइबेरिया से करीब छह हजार किलोमीटर का सफर तय कर करीब बीस हजार कुरजां पहुंचती है। इस बार भी यहां बड़ी संख्या में कुरजां पहुंच चुकी थी।

- एक सप्ताह में इनकी संख्या तेजी से कम होना शुरू हो गई। बरसों से कुरजां की देखभाल करने वाले सेवाराम माली ने बताया कि सात दिन से कुरजां लगातार कम होती जा रही है। दो बाज ने यहां डेरा जमा रखा है। बड़े आकार के इस शिकारी बाज को कुछ लोगों ने कुरजां पर हमला करते भी देखा।

- सेवाराम का कहना है कि बरसों से वे कुरजां की देखभाल कर रहे है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि कुरजां यकायक यहां से कहीं और पलायन कर रही है।

चौंकाने वाला है कुरजां का पलायन

- पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सुमित डऊकिया का कहना है कि शिकार की तलाश में बाज का खींचन पहुंचना सामान्य बात है, लेकिन एक साथ इतनी बड़ी संख्या में कुरजां का पलायन चौंकाने वाला है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये बाज बेहतरीन शिकारी होते है। वैसे भी कुरजां को सुरक्षित माहौल पसंद है। यदि उसे किसी प्रकार के खतरे का आभास होता है तो वह पलायन कर जाती है। पश्चिम राजस्थान के कई गांवों में इन्हें बेहतर माहौल मिलने लगा है। ऐसे में ये अन्य सुरक्षित स्थान की तरफ शिफ्ट हो सकती है।

गांव की पहचान है कुरजां

- प्रदेश में कुरजां खींचन का प्रतीक चिन्ह बनी हुई है। इन विदेशी मेहमानों को रोजाना बारह क्विन्टल ज्वार खिलाई जाती है। पक्षी बढ़ने के साथ इसकी मात्रा भी बढ़ाई जाती है। कुरजां के लिए दाना-पानी की व्यवस्था खींचन का जैन समाज करता है। कई बार अन्य समाज के लोग भी दिल खोलकर मदद करते है। खींचन में हजारों कुरजां के एक साथ दाना चुगने के लिए बनाए गए चुग्गाघर का आकार भी इस बार ग्रामीणों के सहयोग से दो गुना कर दिया गया है। गांव के लोग सामूहिक रूप से इन मेहमानों की सुरक्षा करते है। इस गांव के आसपास आजतक किसी कुरजां का शिकार नहीं हो पाया है। वहीं घायल या बीमार पक्षियों के इलाज की भी अलग से विशेष व्यवस्था की हुई है।

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