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कभी लोगों के हलक तर करता था इनका पानी, अब डाक टिकट के माध्यम से दुनिया को मिलेगी इनकी जानकारी

प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला के प्रतीक स्टेववैल को अब दुनिया डाक विभाग के स्टाम्प के माध्यम से पहचान सकेगी।

SUNIL CHOUDHARY | Last Modified - Jan 02, 2018, 12:11 PM IST

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    जोधपुर। सदियों पूर्व बरसों तक लोगों के हलक तर करने वाली देश की सोलह प्राचीन बावड़ियां(स्टेप वेल) अब डाक टिकट पर भी नजर आएगी। डाक विभाग ने इन पर डाक टिकट जारी किए है। राजस्थान की छह ऐतिहासिक बावड़ियों को भी इसमें शामिल किया गया है। राजस्थान में जोधपुर के तूरजी का झालरा सहित जयपुर की पन्ना मियां की बावड़ी, आभानेरी की चांद बावड़ी, बूंदी की रानी जी की बावड़ी एवं नागर सागर कुंड और अलवर की नीमराना बावड़ी पर डाक टिकट जारी किए गए हैं।विरासत को किया जीवंत...


    - राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इनमें नीमराना बावड़ी नागर सागर कुंड पर जारी डाक टिकट 15 रुपए के और शेष डाक टिकट 5 रुपए के हैं। यादव ने कहा कि बावड़ियां प्राचीन काल से ही जल संरक्षण में अपना अहम योगदान देती रही हैं और इन डाक टिकटों के माध्यम से इस विरासत को जीवंत किया गया है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए बावड़ियां भी एक प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।


    क्या होता है झालरा या बावड़ी


    - झालरा व बावड़ी एक तरह का कुआं होता है। कुओं की अपेक्षा इनके अंदर जाकर पानी भरा जाता था। इसके लिए इनमें नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां बनी होती है। राजस्थान में कलात्मक बावड़ी या झालरों को बनाने की परम्परा रही है।


    ये है जोधपुर का तूरजी का झालरा


    - वर्ष 1740 में महाराजा अभयसिंह की पत्नी महारानी तंवरजी ने राज परिवार की महिलाओं की तरफ से शहर के लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने के इसका निर्माण करवा परम्परा को आगे बढ़ाया।
    - इस झालरे में दो सौ फीट की गहराई पर पर्याप्त मात्रा में पेयजल के रूप में अनमोल खजाना मौजूद है। इस झालरे की खासियत यह है कि मारवाड़ में पड़ने वाले भीषण अकाल के दौरान भी इसका पानी कभी टूटा नहीं।
    - जोधपुर के प्रसिद्ध गुलाबी और लाल घाटू के पत्थरों को तराश कर नृत्य की मुद्रा में हाथी और बारीक नक्काशीदार झरोखे इस झालरे की शान है। ऐसा माना जाता है कि कभी इन झरोखों में बैठने के लिए अप्सराएं आती थी।
    - शहर में आने वाला प्रत्येक पर्यटक एक बार इस झालरे के कलात्मक निर्माण को देखने अवश्य पहुंचता है और कुछ देर यहां बैठ इतिहास में खो जाता है।


    ये है अन्य बावड़ियां


    - राजस्थान में दौसा के पास स्थित आभानेरी की चांद बावड़ी की। इसे भूल-भुलैया वाली बावड़ी भी कहा जाता है। कहा जाता है कि यहां सीढ़ियां ऐसे बनी हुई हैं कि आप जिस रास्ते से नीचे जाते हैं उस रास्ते से ऊपर नहीं आ सकते। बावड़ी में साढ़े तीन हजार सीढ़ियां हैं।
    - राजस्थान के बूंदी शहर में स्थित है रानीजी की बावड़ी। यहां बावड़ी में कई कुओं का निर्माण किया गया है जिनमें बारिश के दौरान पानी भरा रहता है। दूरदराज से पर्यटक इसे देखने के लिए यहां आते हैं। अपनी स्थापत्य कला के लिए ये खास पहचान रखती है।
    - जयपुर के आमेर के पास स्थित है पन्ना मियां की बावड़ी। इस बावड़ी को स्थानीय लोग पन्न मीना की बावड़ी भी कहते हैं। इस बावड़ी के एक ओर जयगढ़ दुर्ग और दूसरी ओर पहाड़ों की नैसर्गिक सुंदरता है। बावड़ी अपनी विशेष आकार की सीढ़ियों और बरामदों के लिए विख्यात है।
    - बूंदी के केंद्र में चोगन गेट के पास दो कुंड हैं। जिन्हें जनाना सागर और गंगा सागर कहा जाता था, लेकिन अब इसे संयुक्त रूप से नागर सागर कुंड कहा जाता है।
    - अलवर जिले में नीमराणा कस्बे के तत्कालीन शासक राजा महासिंह ने १२५ सीढिय़ों वाली इस नौ मंजिला बावड़ी का निर्माण कराया था। अपने विशाल रूप के कारण जिले में यह बावड़ी विशेष महत्व रखती है।

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    जोधपुर के तूरजी का झालरा को भी इसमें शामिल किया गया है।
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    राजस्थान के दौसा के निकट आभानेरी की चांद बावड़ी।
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    राजस्थान के बूंदी शहर स्थित रानीजी की बावड़ी।
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    जयपुर में पन्ना मियां की बावड़ी।
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    बूंदी का नागर सागर कुंड।
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    नीमराणा की नौ मंजिला बावड़ी।
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