जोधपुर

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मारवाड़ में एक बार फिर जीवंत हुआ सदियों पुराना यह खेल, देखने उमड़े ग्रामीण

मारवाड़ में एक बार फिर जीवंत हुआ सदियों पुराना यह खेल, देखने उमड़े ग्रामीण

Dainik Bhaskar

Jan 29, 2018, 11:01 AM IST
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जोधपुर। शारीरिक शक्ति के प्रदर्शन का सदियों पुराना खेल मल्ला एक बार फिर मारवाड़ के ग्रामीण क्षेत्र में जीवंत हो रहा है। दशकों पूर्व भूला दिए गए इस खेल के प्रति ग्रामीणों में एक बार फिर रुझान बढ़ रहा है। जोधपुर जिले के फलोदी में आयोजित मल्ला प्रतियोगिता में पोकरण के युवा किशोर पुरोहित 57.5 किलोग्राम का मल्ला उठा विजेता बने। ऐसा होता है मल्ला...


- मल्ला एक तरह की यह वेट लिफ्टिंग है, लेकिन इसमें प्रतियोगी दोनों हाथ के बजाय एक हाथ से ही वजन उठाता है। छोटे-बड़े पत्थरों को तराश कर अलग-अलग भार के मल्ले बनाए जाते है। पत्थरों को तराश कर उनमें एक हैंडल बनाया जाता है। इस वजनी पत्थर को एक हाथ से उठा कर हवा में लहराना पड़ता है।


मल्ला देखने उमड़े लोग


- इस प्राचीन खेल को फिर से जीवंत करने का क्रीड़ा भारती फलोदी ने बीड़ा उठाया. गत वर्ष के सफल आयोजन के बाद इस बार रविवार को फलोदी में आयोजित मल्ला प्रतियोगिता में भाग लेने व देखने को बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़े। आयोजक विशंभर थानवी का कहना है कि इस माध्यम से युवाओं को मारवाड़ के प्राचीन खेल से रूबरू कराया जा रहा है। मल्ला उठाने का क्रेज बढ़ने से युवाओं का रुझान एक बार फिर से शारीरिक सौष्ठव की तरफ बढ़ेगा।


किशोर बने मल्ला


- मल्ला श्री प्रतियोगिता क लिए आयोजकों ने फलोदी में विभिन्न समाज की बगीचियों में रखे अलग- अलग भार के आठ मल्ले एकत्र किए गए, जो 25 किलो से 57.5 किलो तक के थे। पोकरण निवासी किशोर पुरोहित मल्ला श्री 2018 चुने गए। उन्होंने 57.5 किलोग्राम के मल्ले को दो बार उठा हवा में लहराया। इसके साथ ही किशोर ने बैंच प्रेस में 150 किलोग्राम, डेड लिफ्टर में 250 किलो भार चार बार उठाकर अपने भार वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अन्य भार वर्ग में मयंक कल्ला, बरकत खां, शेराराम सांसी, सुभाष रंगा, अली खां विजेता रहे।


वेट लिफ्टिंग का प्राचीन स्वरूप है मल्ला


- मल्ला को वेट लिफ्टिंग का प्राचीन स्वरूप माना जाता है। पुराने दौर में अखाड़ों में वर्जिश करने वाले पहलवान मल्ला उठा अपना दमखम प्रदर्शित किया करते थे। दशकों पूर्व लोगों में मल्ला उठाने को लेकर बहुत क्रेज हुआ करता था। ग्रामीण क्षेत्र में आयोजित होने वाले हर छोटे बड़े आयोजन जैसे हथाई, शादी- विवाह व तीज त्यौहार पर एकत्रित होने पर लोगों द्वारा मल्ला उठाने का प्रयास किया जाता था। जो सबसे ज्यादा वजन का मल्ला उठाकर जितने अधिक बार उसे हवा में लहराता था वो उतना बड़ा बलशाली पहलवान माना जाता था। धीरे-धीरे लोगों का इस खेल के प्रति रुझान कम होता चला गया। लोगों ने मल्ला को पूरी तरह से बिसरा दिया। अभी भी पशु बाड़ों व ग्रामीण क्षेत्र में समाज के भवनों में मल्ले आसानी से नजर आ जाते है।

सभी फोटो कैलाश बेनीवाल, फलोदी

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