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उम्मेद भवन पैलेस के निर्माण का एक दुर्लभ छायाचित्र, ऐसे आकार लिया था दुनिया के इस अंतिम महल ने

उम्मेद भवन पैलेस के निर्माण का एक दुर्लभ छायाचित्र, ऐसे आकार लिया था दुनिया के इस अंतिम महल ने

SUNIL CHOUDHARY | Last Modified - Nov 24, 2017, 02:15 PM IST

जोधपुर। एक प्रवासी मारवाड़ी बिजनेस टायकून की बेटी की शाही अंदाज में हो रही शादी के कारण विश्व प्रसिद्ध उम्मेद भवन एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बीच इसके निर्माण के दौरान का एक दुर्लभ फोटो सामने आया है। इस फोटो में दुनिया में बना यह अंतिम शाही महल आधा बना हुआ नजर आ रहा है। मारवाड़ के शाही परिवार का यह निवास दुनिया में सबसे बड़ा निजी आवासीय परिसर है। अब इसका एक हिस्सा होटल में बदला जा चुका है। इस महल के निर्माण की जानकारियां...


अकाल राहत के लिए हुआ निर्माण

- मारवाड़ और अकाल का सदियों पुराना नाता रहा है। तीन बरस अकाल के पश्चात यहां एक बरस सुकाल रहता था। बहुत कम बारिश होने के कारण मारवाड़ के लोग रोजगार की तलाश में यहां से पलायन कर जाते थे। ऐसे में तीस के दशक में पड़े भीषण अकाल के दौरान तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह ने लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उम्मेद भवन का निर्माण शुरू कराया। चौदह बरस तक चले इस निर्माण पर तीन हजार लोगों को प्रत्यक्ष व हजारों लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला।


लागत आई महज डेढ़ करोड़


- विश्व के बेहतरीन होटल का खिताब हासिल कर चुके उम्मेद भवन के निर्माण पर उस समय महज डेढ़ करोड़ की लागत आई। अब अनमोल माने जाने वाले उम्मेद भवन की कम लागत के पीछे मुख्य कारण यह रहा कि इसमें कुछेक चीजों को छोड़ अधिकांश स्थानीय सामग्री काम में ली गई। स्थानीय सामग्री पर शाही परि वार का हक होता था। ऐसे में उन्हें इसके लिए अलग से कुछ भुगतान नहीं करना पड़ा।


पत्थर लाने को बिछाई रेल लाइन


- इस पैलेस के निर्माण में जोधपुर के छीतर पत्थर का उपयोग किया गया। इसके लिए महाराजा ने सूरसागर के निकट फिदुसर में विशेष खान से पत्थर निकालना तय किया। इस खान को आज भी राज खान के नाम से जाना जाता है। पत्थर का परिवहन करने को उन दिनों इतने साधन नहीं थे। ऐसे में फिदुसर से प्रस्तावित महल के निर्माण स्थल तक बारह मील लम्बी मीटर गेज लाइन बिछाई गई। पत्थर परिवहन के लिए विशेष प्रकार के डिब्बों का निर्माण किया गया। इस मार्ग से रोजाना एक रेलगाड़ी पूरी तरह से प्रस्तर खंडों से लदकर निर्माण स्थल पर पहुंचती।


बर्मा से आई लकड़ी


- उम्मेद भवन के निर्माण में लकड़ी के काम के लिए बर्मा टीक काम में ली गई। इसके लिए विशेष रूप से बर्मा(म्यांमार) से लकड़ी मंगाई गई। इसके लिए बड़ी संख्या में कारीगरों ने वर्षों तक इसके खिड़की व दरवाजों का निर्माण किया। इसके लिए बीस हजार घनफीट लकड़ी काम में ली गई। उस समय इसकी लागत महज साठ हजार रुपए ही आई। वर्तमान दौर में यह राशि करोड़ों में है।


रोशन होने में पूरे शहर से तीन गुना ज्यादा बिजली


- भव्य उम्मेद भवन को रोशन करने के लिए अलग-अलग आकार के दस लाख मीटर लम्बाई के तार बिछाए हुए है। उस समय इसे रोशन करने को ढाई हजार किलोवाट बिजली की आवश्यकता होती थी। जबकि वर्ष 1943 में पूरे जोधपुर की बिजली की खपत इसकी एक तिहाई ही थी।


सोने का ताला खोल किया उद्घाटन


- उम्मेद भवन का उद्घाटन महाराजा उम्मेद सिंह के पुत्र व वर्तमान में पूर्व नरेश गजसिंह के पिता हनवंत सिंह के विवाह पर 13 फरवरी 1943 को किया गया। महाराजा के छोटे पुत्र सात वर्षीय दिलीप सिंह ने इसके मुख्य द्वार पर लगे सोने के ताले को खोल इसका विधिवत उद्घाटन किया।

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