--Advertisement--

बकरे के खून से होगा थैलेसीमिया का इलाज; अब 6 माह बाद ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ेगी

पशु ऐसे भी काम आएंगे, अभी इस बीमारी से ग्रस्तों को 1-1 माह में पड़ जाती है खून चढ़ाने की जरूरत

Dainik Bhaskar

Aug 13, 2018, 06:43 AM IST
goat's blood will be treated with Thalassemia

जोधपुर. अब थैलेसीमिया रोगियों का इलाज बकरे के ताजे खून से होगा। आश्चर्य हुआ ना, लेकिन यह सच है। राजस्थान में पहली बार डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन विश्वविद्यालय में जल्द ही थैलेसीमिया रोगियों के लिए एक नया प्रोजेक्ट शुरू होने वाला है।

इसके तहत इलाज के बाद थैलेसीमिया राेगियाें को चार से छह माह तक खून चढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यह उपचार बकरे के ताजे खून से होगा। यह इलाज शुरू करने की स्वीकृति राज्य सरकार से मिल चुकी है। यूनिवर्सिटी ने आयुर्वेद अस्पताल में यह इलाज शुरू करने की कवायद भी शुरू कर दी है। कुलपति प्रो. राधेश्याम शर्मा ने इसका जिम्मा पंचकर्म के प्रोफेसर डॉ. महेश शर्मा को सौंपा है। इस इलाज को मूर्त रूप देने के लिए यूनिवर्सिटी की रिसर्च स्कॉलर संतोष चौधरी को भी जिम्मा सौंपा है। प्रो. शर्मा ने बताया कि इलाज के लिए दो पद्धतियां अपनाई जाएंगी। यह सुविधा निशुल्क होगी।

ये होंगी इलाज की विधियां, अजा रक्त बस्ति चिकित्सा: इसमें रोगी के आवश्यक परीक्षण के बाद गुदा मार्ग से बकरे का ताजा खून प्रवेश करवाया जाता है। इसे अजा रक्त बस्ति के नाम से जाना जाता है। यह विधि दर्द एवं दुष्प्रभाव रहित है। इसके बाद ब्लड ट्रांसफ्यूजन होने पर रक्त मेंं आयरन का स्तर कम हो जाता है और थैलेसीमिया रोगियों को करीब 4 से 6 माह के बाद रक्त की जरूरत पड़ती है।

आयरन चिलेशन व परिपक्व आरबीसी निर्माण विधि: आयुर्वेद की एक पद्धति धात्री अवलेह से आयरन चिलेशन एवं परिपक्व आरबीसी निर्माण करवाया जाएगा। जिससे आरबीसी का विखंडन होगा और अतिरिक्त तथा अनावश्यक आयरन शरीर से बाहर चला जाएगा। जिससे थैलेसीमिया रोगियों के शरीर में मौजूद खून में आरबीसी का लेवल सही हो जाएगा।

थैलेसीमिया मेजर ज्यादा घातक ऐसे रोगियों को भी मिलेगी राहत: प्रो. राधेश्याम शर्मा के अनुसार थैलेसीमिया मेजर सबसे घातक होता है। इसमें आरबीसी परिपक्व होने से पहले ही विखंडित हो जाती है तथा हीमोग्लोबिन का स्तर नीचे आ जाता है। ऐसे में आरबीसी से निकला हुआ आयरन थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए घातक हो जाता है। ऐसे में आयरन चिलेशन चिकित्सा देनी होती है।

आयुर्वेद के अनुसार मॉडर्न साइंस में होते हैं दुष्प्रभाव : मेजर से पीड़ित बच्चों को बार-बार रक्ताधान करवाना पड़ता है, जिससे निम्न दुष्प्रभावों की संभावना रहती है-
1. संक्रामक रोग होने की संभावना
2. सीरम फेरिटिन लेवल का बढ़ना।
3. रक्त में अतिरिक्त आयरन बढ़ना।

X
goat's blood will be treated with Thalassemia
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..