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उम्मेद भवन पहली बार बनेगा रस्म ‘पाग रौ रंग’ दस्तूर का गवाह

राठौड़ दरबार हॉल में शोकसभा में उदयपुर के पूर्व महाराजा भी शामिल हुए। आज आधे घंटे की होगी पाग दस्तूरी राठौड़...

Danik Bhaskar | Jul 12, 2018, 04:40 AM IST
राठौड़ दरबार हॉल में शोकसभा में उदयपुर के पूर्व महाराजा भी शामिल हुए।

आज आधे घंटे की होगी पाग दस्तूरी

राठौड़ दरबार हाल में 12 दिन से पूर्व राजमाता के निधन के बाद तापड़ बिछी हुई है। गुरुवार को उठावणा होगा। सुबह 11 गरुड़ पुराण पाठ व पूजा कराई जाएगी। फिर पाग दस्तूर रस्म शुरू होगी। जिनके पिता नहीं है, वे सफेद रंग व जिनके पिता जीवित हैं, वे खाकी साफा पहने हुए होंगे। दोनों साफे का रंग बदलवा गुलाबी या केसरिया साफा बधवाएंगे। पूर्व नरेश के ससुराल कश्मीर के पूंछ राजघराने से रिश्तेदार आएंगे और सबसे पहले पूर्व नरेश के साफे का रंग बदलवाएंगे। फिर पुत्र शिवराज सिंह और अन्य लोगों के साफों के रंग बदलवाने की रस्म अदा होगी। इसके बाद उम्मेद भवन के पोर्च के बाहर उठावणा होगा। वहां पूर्व राजमाता की तस्वीर पर पुष्पांजलि के साथ शोक सभा समाप्त होगी।

मारवाड़ के पूर्व जागीरदार व ठिकानों के प्रमुख भी आएंगे: शोक सभा में शरीक होने के लिए बुधवार को मेवाड़ के पूर्व नरेश अरविंदसिंह मेवाड़ भी पहुंचे। गुरुवार को पूर्व राजमाता के उठावणे व पाग रो रंग दस्तूर में शरीक होने के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी आ रही हैं। पूर्व मारवाड़ रियासत के जागीरदार, राजा, ठिकाणेदार सहित सभी प्रमुख लोग पहुंचेंगे वहीं पूर्व नरेश के ससुराल पूंछ (कश्मीर) तथा पूर्व राजमाता के पीहर ध्रांगध्रा से उनके भतीजे सिद्धराज सिंह सहित कई प्रमुख लोग शामिल होंगे।

अंतिम बार राइकाबाग पैलेस में थी रस्म

शाही परिवार में किसी की मृत्यु होने पर जो लोग मुंडन व मूंछ कटवाते हैं, उनके साफे बदलवाए जाते है। मारवाड़ के पूर्व राजघराने में अंतिम बार शोक और पाग का रंग बदलने का दस्तूर राइकाबाग पैलेस में हुआ था। 28 नवंबर, 1975 को पूर्व राजदादी बदन कंवर भटियाणी का निधन हुआ था। शवयात्रा राइकाबाग से निकली और जसवंतथड़ा पर अंतिम संस्कार हुआ था। इंटैक जोधपुर चैप्टर संयोजक डॉ. महेंद्रसिंह तंवर ने बताया कि राइकाबाग पैलेस में ही तापड़ रखी थी और उठावणे के दौरान शोक तोड़ने व पाग का रंग दस्तूर हुआ था। 1952 में पूर्व नरेश हनवंत सिंह की मृत्यु होने पर घंटाघर में तापड़ रखी थी और यह रस्म वहीं पर निभाई थीं। शाही परिवार की इन रस्मों का जिक्र मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के पूर्व महानिदेशक डॉ. महेंद्रसिंह नगर की पुस्तक “रसीलेराज’ में भी उल्लेख है।