मारवाड़ की राजनीति में अखरने लगी क्षत्रपों की कमी, अपने क्षेत्र तक सिमटे नेता / मारवाड़ की राजनीति में अखरने लगी क्षत्रपों की कमी, अपने क्षेत्र तक सिमटे नेता

अपने-अपने क्षेत्रों में दबदबा रखने वाले क्षत्रपों का दौर गुजरे जमाने की बात हो गई

DainikBhaskar.com

Jun 13, 2018, 03:16 PM IST
marwar have no more powerfull local leaders

जोधपुर। प्रदेश में राजनीति में कई कद्दावर नेताओं के दम पर हमेशा अपना दबदबा कायम रखने वाले मारवाड़ में अब क्षत्रप वीहिन हो चुका है। अपने-अपने क्षेत्रों में दबदबा रखने वाले क्षत्रपों का दौर गुजरे जमाने की बात हो गई। क्षत्रपों की सबसे अधिक कमी कांग्रेस को खल रही है। क्षत्रपों के स्थान पर अब कांग्रेस की तरफ से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो भाजपा पूरी तरफ से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ही पार्टी का चेहरा बने हुए है। समाप्त हुआ क्षत्रपों का दौर…

 

 

- मारवाड़ ने प्रदेश को कई दिग्गज नेता दिए। इनमें नाथूराम मिर्धा, परसराम मदेरणा, खेतसिंह राठौड़, पूनमचन्द विश्नोई, रामसिंह विश्नोई, गंगाराम चौधरी, माधोसिंह दीवान प्रमुख थे। इन लोगों के इशारों पर मारवाड़ की पूरी राजनीति फिजा बदल जाती थी। इन नेताओं के दौरा में सैकंड लाइन पनप ही नहीं पाई। यहीं कारण रहा कि इनके अवसान के साथ ही क्षत्रपों का दबदबा समाप्त हो गया। क्षत्रपों के नहीं रहने का खामियाजा सबसे अधिक कांग्रेस को उठाना पड़ा। कांग्रेस के पुराने क्षत्रपों ने केवल खुद की जाति को ही साथ में नहीं लिया बल्कि अन्य छोटे जाति समूहों को अपने साथ जोड़े रखा। इसका लाभ उन्हें चुनाव में हमेशा मिलता रहा। वहीं भाजपा में शुरू से ही क्षत्रप नहीं रहे। भाजपा की राजनीति पहले भैरोसिंह शेखावत और अब मुख्यमंत्री वसुधंरा राजे के इर्दगिर्द ही घूमती है।  

 

कांग्रेस को उठाना पड़ा भारी नुकसान

 

- क्षत्रपों के नहीं रहने का खामियाजा कांग्रेस को गत विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ा। मारवाड़ के 43 विधानसभा क्षेत्र में उसके महज तीन प्रत्याशी ही जीत पाए। वहीं भाजपा ने 39 सीटें जीत ली। राजनीतिक विषलेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस के क्षत्रप होते तो उसकी ऐसी बुरी हालत नहीं होती। वर्तमान दौर के अधिकांश नेता अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित होकर रह गए है। ऐसे में वे अन्य सीटों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं रहे।

 

ये थी क्षत्रपों की ताकत

 

- आपातकाल के पश्चात वर्ष 1977 में कांग्रेस का पूरे उत्तर भारत से सूपड़ा साफ हो गया, लेकिन नागौर में नाथूराम मिर्धा ने अपने दम पर जीत हासिल कर सभी को अपनी मजबूत पकड़ का अहसास करवा दिया। इसके बाद नाथूराम मिर्धा ने अपने दम पर कई प्रत्याशियों को चुनाव में विजयी बनवाया। मारवाड़ के क्षत्रपों की ताकत का ही कमाल था कि इसके तुरंत पश्चात हुए विधानसभा चुनाव में मारवाड़ की 42 सीटों में से कांग्रेस ने 26 सीटें जीत ली।

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