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175 वर्ष पहले ऐसे होते थेराजसी होली के रंग

एक वर्ष पहले
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चित्रकार : बुलाकी, सौजन्य- मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट

जोधपुर| राजा-रानियों की कहानियां तो हम सभी बचपन से सुनते आए हैं। इनकी राजसी जिंदगी, सुख-सुविधाएं अाैर ऐश्वर्यपूर्ण जिंदगी को लेकर भी कौतुहल बना रहता है। उस पर भी यह जानने की तो सबमें उत्कंठा रहती है कि राजपरिवार के तीज-त्योहार कैसी शानो-शौकत से मनाए जाते होंगे। होली के इस रंग-बिरंगे अवसर पर हमनें इन्हीं सहज जिज्ञासाओं के उत्तर ढूंढे। हमें राजा-रानी की कहानी नहीं बल्कि असली जिंदगानी के सबरंग दिखाती 175 साल पुरानी पेंटिंग मेहरानगढ़ में मिली। वर्ष 1845 की यह पेंटिंग तत्कालीन राजपरिवार द्वारा मनाई जा रही होली के सप्त रंग दिखा रही है। इसमें तत्कालीन महाराजा तखतसिंह मेहरानगढ़ स्थित मोती महल में हैं। वे पिचकारी से राजसी महिलाओं पर रंग छिड़क रहे हैं। राजपरिवार की महिलाएं भी उन पर वापस रंग फेंक रही हैं। पूरे परिदृश्य में अबीर अौर गुलाल के रंग बिखरे हैं। चाैक में रंगों से भरे कड़ाह एवं व्यंजनाें से भरे थाल पड़े हैं। चंग की थाप से संगीतज्ञ महिलाअाें ने माहाैल काे संगीत रंगी भी कर रखा है।
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