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अपने बुलंद इरादों से परिवार ही नहीं, समाज को भी राह दिखाने वाली 2 महिलाएं...

एक वर्ष पहले
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अगर इरादें मजबूत हों तो फिर महिलाओं को कोई रोक नहीं सकता। मिलिए शहर की दो ऐसी महिलाओं से जिन्होंने करीब 40 साल पहले इंटर कास्ट मैरिज करने का साहस दिखाया और घरवालों ही नहीं, सामाजिक चुनौतियों का सामना भी किया। चुनौतियों का सामना करते-करते इनकी ताकत का नया पहलू भी सामने आया। अपने इरादों पर डटे रहकर इन महिलाओं ने ऐसी शुरुआत की जो शहर के लिए मिसाल बन गई....

अनुराधा आडवाणी: उन बुजुर्गों को संभाल रहीं जिन्हें घरवाले ही छोड़कर जा रहे

अनुराधा ने करीब 40 साल पहले नरेंद्र आडवाणी से लव मैरिज की थी तो घरवाले और लोग कह रहे थे कि यह शादी लंबी नहीं चलेगी लेकिन आज वे कहती हैं कि हमारी शादी न केवल मिसाल बनीं बल्कि इन सालों में कभी हमारी आपस में नोक-झाेंक तक नहीं हुई। थिएटर आर्टिस्ट, एंकर और सोशल वर्क से जुड़ी अनुराधा कहती हैं, मैंने अपने सास-ससुर को बीमारी की वजह से आठ वर्ष तक बिस्तर पर सिसकते देखा तो उनकी पीड़ा समझी। कई बुजुर्गों की दर्द भरी आपबीती भी सुनी कि जिस उम्र में बुजुर्गों को बच्चों की ज़रुरत होती है उस उम्र में बेटे ही साथ छोड़ देते हैं। ऐसे में एक फैसला लिया। साल 2002 में शहर का पहला वृद्धाश्रम अनुबंध शुरू किया। वे कहती हैं, उस समय सभी मेरा मजाक बना रहे थे कि मैं शहर में गलत ट्रैंड शुरू कर रही हूं। इस आश्रम में कोई नहीं आएगा। लेकिन मैं डटी रही। थोड़ा पैसा लगाकर एक कच्ची बिल्डिंग में कुछ कमरे बनाए। जैसे ही यह रहने लायक बना तो आधी रात को एक बुजुर्ग ने दरवाजा खटखटाया और अंदर आने की मजबूरी बताई। 15 दिनों के भीतर ये पहला केस आया। बुजुर्ग से बात की तो पता चला कि उनके चार बेटे और तीन बेटियां थीं लेकिन सबने उन्हें घर से निकाल दिया है। वे 15 दिनों से मंदिर की सीढ़ियां पर रातें गुजार रहे थे। ऐसे ही शुरुआत में कई समस्याएं आईं। ये बुजुर्ग मुझसे बात ही नहीं करते थे। कहते थे पति, पिता या किसी आदमी को बुलाओ। मैं समझाती तो कहते कि सलाह करनी है और तुम महिला हो। कैसे बात करें? बाद में धीरे-धीरे जब डॉक्टर के साथ मैं इनसे मिलतीं, आधी रात में इनके पास पहुंचती तो इन्हें विश्वास होने लगा और ये खुलकर मुझसे परेशानियां शेयर करने लगे। कई रातें इन बुजुर्गों को समझाने और इनकी बात सुनने में निकाल चुकीं अनुराधा आज भी जरूरत पड़ने पर आधी रात को अकेली यहां पहुंच जाती है। आज 75 बुजुर्ग यहां रह रहे हैं।

सुषमा अरोड़ा: हैंडीक्राफ्ट फैक्ट्री में पति का हाथ बंटाने पहुंचीं, लेबर के साथ चलाए हथौड़े

जेएनवीयू में फिजिक्स की हैड ऑफ डिपार्टमेंट रहीं सुषमा अरोड़ा का हैंडीक्राफ्ट इडस्ट्री में बड़ा नाम है। वे बताती हैं, मैं मारवाड़ी परिवार से थी और अनिल पंजाबी। वे आर्मी बैकग्राउंड से थे। हमने 1980 में लव मैरिज की। घरवालों को समझाने से लेकर लोगों का सामना करना काफी चुनौती भरा रहा क्योंकि उस समय इंटर कास्ट मैरिज को लोग एसेप्ट ही नहीं करते थे। मैं फिजिक्स की लेक्चरार थी और जेएनवीयू में क्लासेज लेती थी। मेरे पति अनिल आर्मी के लिए व्हाइट मेटल की ट्राफियां और शील्ड बनाते थे। पहले वे पार्टनरशिप में काम करते थे लेकिन बाद में अपनी कंपनी गोरा एक्सपोर्ट बनाकर आयरन के टूल वेयर का काम शुरू किया। यह काम कुछ अलग था। मैं टीचिंग जॉब में थी और मेरा इस इंडस्ट्री से कोई कनेक्शन तक नहीं था। बस, कभी पति के साथ टूल्स के डिजाइन वगैरह पर बात हो जाती। लेबर को समझाने में आने वाली दिक्कतें भी वे मुझसे शेयर करते। उन्हीं दिनों मैंने अपने फ्री टाइम में फैक्ट्री जाना शुरू किया और टूल्स पर हैंड पेंटिंग और डिजाइनिंग करने लगी। इसमें कंटेम्परेरी, चाइनीज, ओरिएंटल और यूरोपियन आर्ट की ये डिजाइनिंग विदेशों में पसंद आने लगी। 2009 में अचानक अनिल को न्यूरो प्रॉब्लम हो गई तो फैक्ट्री चलाने की पूरी जिम्मेदारी मुझ पर आ गईं। कॉलेज से आकर मैं फैक्ट्री जाती तो पता चलता कि कभी कोई लेबर नहीं आया या कुछ प्रॉब्लम आ रही है। मैंने अपनी फैक्ट्री में हथौड़े भी चलाए और लेबर के साथ काम में जुटी ताकि बाहर से आए ऑर्डर पूरे कर सकूं। कभी-कभी तो मुझे 14-15 घंटे तक फैक्ट्री में बिताने पड़े। बाद में अनिल की डेथ हो गई। मैंने खुद को इस बिजनेस में ही पूरी तरह समर्पित कर दिया। सुषमा को जोधपुर ईपीसीएच की ओर से लेडी एंटरप्रिन्योर अवार्ड और यूएसए में उनके बनाए प्रॉडक्ट को अवार्ड मिल चुका है।

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