प्रदोष वेला में शाम 6:40 से रात 9:04 बजे तक शुभ मुहूर्त
खुशियों का त्योहार होली सोमवार से शुरू होगा। पूर्णिमा सुबह 3:03 बजे से शुरू हो जाएगी। वहीं दोपहर 1:10 बजे तक भद्रा की स्थिति रहेगी। वहीं होलिका दहन शाम को प्रदोष वेला में 6:40 से रात 9:04 बजे तक के शुभ मुहूर्त में होगा। पूर्णिमा तिथि रात 11:17 बजे तक रहेगी। पं. रमेश भोजराज द्विवेदी ने बताया कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6.40 बजे से होगा। होलिका दहन में गोबर के उपले, जायफल, लॉन्ग, कर्पूर, इलायची, हवन सामग्री, पीपल की लकड़ी, नीम की लकड़ी आदि से से पूजा होगी।
हाेली स्नेह मिलन अाज
श्री जलजाेग चाैराहा व्यापार मंडल की ओर से हाेली स्नेह मिलन सोमवार को शाम 7:30 बजे चौराहे के पास सत्यनारायण मंदिर में होगा। मंडल के ईश्वर खिलनानी ने बताया कि इस दौरान होली दहन सहित कार्यक्रम होंगे।
होलिका दहन की पूजा विधि
{होलिका दहन के शुभ मुहूर्त से पहले पूजन सामग्री के अलावा चार मालाएं अलग से रख लें।
{इनमें से एक माला पितरों की, दूसरी हनुमानजी की, तीसरी शीतला माता और चौथी घर परिवार के नाम की होती है।
{दहन से पूर्व श्रद्धापूर्वक होली के चारों ओर परिक्रमा करते हुए सूत के धागे को लपेटते हुए चलें।
{परिक्रमा तीन या सात बार करें।
{एक-एक कर सारी पूजन सामग्री होलिका में अर्पित करें।
{जल से अर्घ्य दें।
{घर के सदस्यों को तिलक लगाएं।
{इसके बाद होलिका में अग्नि लगाएं।
{अगले दिन सुबह-सवेरे उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर पितरों का तर्पण करें।
{घर के देवी-देवताओं को अबीर-गुलाल अर्पित करें।
{अब घर के बड़े सदस्यों को रंग लगाकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।
{इसके बाद घर के सभी सदस्यों के साथ आनंदपूर्वक होली खेलें।
होली की राख माथे पर लगाने से नहीं होता है बुरे साये का असर
होलिका दहन की अग्नि को बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन की राख को लोग अपने शरीर और माथे पर लगाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से कोई बुरा साया आसपास भी नहीं फटकता है। होलिका दहन इस बात का भी प्रतीक है कि अगर मजबूत इच्छा शक्ति हो तो कोई बुराई आपको छू भी नहीं सकती। भक्त प्रहलाद अपनी भक्ति और इच्छा शक्ति से अपने पिता की बुरी मंशा से हर बार बच निकले।