द्रौपदी के चीरहरण की कथा का किया वर्णन

2 वर्ष पहले
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संगीत कला निकेतन संस्था की ओर से मेडिकल कॉलेज अाॅडिटाेरियम में शनिवार काे राजमाता कृष्णाकुमारी गर्ल्स पब्लिक स्कूल की डांस टीचर डॉ. पीयूश्री शुक्ला ने आरंगेत्रम के लिए प्रस्तुति दी। डॉ. शुक्ला की मां विदूषी पुलमा दास जोशी ने कहा कि दर्शकों का आशीर्वाद ही कलाकार के लिए एक उपहार है। उन्हाेंने गणेश वंदना की। इसके बाद पीयूश्री ने दो घंटे में पुष्पांजलि, आलारिपू, जतिस्वरम, वर्णम, कीर्तनम, शब्दम पदम और तिल्लाना की बेहतरीन प्रस्तुति दी। भाव भंगिमाओं के रूप रोचक तरीके से दिखाए। दो घंटे की प्रस्तुति के बाद डॉ. पीयूश्री को गुरु सरोजा वैद्यनाथन ने आरंगेत्रम की उपाधि प्रदान की। गायन में ललिता गणेश, मृदंगम पर सुधीर कुमार और वायलिन पर अन्ना दुरई ने संगत दी। प्राेग्राम के चीफ गेस्ट पूर्व नरेश गजसिंह और हेमलता राजे थे।

jodhpur sunday, 30/6/2019 . 3

बचपन में टॉनिक की तरह मिली थी क्लासिकल म्यूजिक की घुट्‌टी
सिंगिंग, कथक और भरतनाट्यम की पारंगत नृत्यांगना डॉ. पीयूश्री शुक्ला ने शनिवार काे मेडिकल काॅलेज अाॅडिटाेरियम में दी अारंगेत्रम की प्रस्तुति
शाना| जोधपुर

क्लासिकल सिंगर, कथक और भरतनाट्यम की पारंगत नृत्यांगना डॉ. पीयूश्री शुक्ला का कहना है कि क्लासिकल म्यूजिक सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि पूरी पढ़ाई है। आज बहुत से ऐसे डांस पैदा हो गए हैं जिनमें यूथ अंजाम सोचे बिना कूद पड़ते हैं और थोड़ा बहुत सीखकर परफॉर्म करना शुरू कर देते हैं। यह एक आर्टिस्ट और मंच दोनों की ही तौहीन होती है। इसलिए जो भी म्यूजिक फॉर्म चुनें, उसकी कंपलीट पढ़ाई कर परफेक्शन हासिल करके ही मंच पर उतरें। टीचर, बहू, मां, बेटी, गुरु, प|ी और आर्टिस्ट की भूमिका निभाने वाली डॉ. पीयूश्री शुक्ला ने शनिवार को भरतनाट्यम में ज्ञानेंद्र की उपाधि हासिल की। डॉ. शुक्ला ने बताया, मेरे घर का माहौल ही संगीतमय रहा अाैर यूं समझिए कि मुझे टाॅनिक की तरह म्यूजिक की घुट्टी ही मिली। पिता मधुसूदन जोशी और मां पुलमादास जोशी भी क्लासिकल म्यूजिक के आर्टिस्ट हैं अाैर इसलिए छह वर्ष की उम्र से ही मेरी भरतनाट्यम की शिक्षा शुरू हो गई। पिता की जॉब ट्रांसफरेबल थी तो हम लखनऊ चले गए। वहां मैंने कथक सीखा और पांच वर्ष का विशारद कोर्स किया। कॉलेज में आई तो गायन को आगे बढ़ाया। जयपुर वनस्थली विद्यापीठ से संगीत में पीएचडी की। लंबे गेप के बाद फिर भरतनाट्यम शुरू किया और ज्ञानेंद्र तक का सफर तय किया। डॉ. शुक्ला ने बताया, म्यूजिक मेरे लिए उस मां की तरह है जिसके लिए अपने सभी बच्चे प्यारे होते हैं। इसलिए गायन और डांस दोनों ही समान है। मेरी खुशनसीबी यह है कि मैंने अपने गुरु ज्ञानेंद्र दत्त वाजपेयी से भरतनाट्यम सीखा और तंजावुर घराने को आगे बढ़ाने का काम किया जो कि बहुत कठिन बात है। आज के समय में लोग नए-नए डांस फॉर्म को कुछ समय में सीखकर टाइम खराब करते हैं और ना तो खुद समझ पाते हैं और ना ही किसी को समझा पाते हैं। ऐसे समय में क्लासिकल को बचाए रखना एक बड़ी जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी के लिए म्यूजिक सीखना और सही परफॉर्म करना एक ड्यूटी हो गई है। डॉ. शुक्ला ने कहा कि मेरे लिए यह एक चुनौती थी। फैमिली की देखभाल के साथ स्कूल में बच्चाें काे म्यूजिक सिखाना अाैर खुद राेजाना चार घंटे डांस की प्रेक्टिस के लिए निकालना मुश्किल तो था लेकिन पति विकास शुक्ला ने सपोर्ट से सब आसानी से चलता रहा।

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