पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

एक होली ऐसी भी... विश्नाेई समाज होली दहन नहीं करता, पानी बचाने के लिए नहीं लगाते रंग

एक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

रंगों का पर्व होली अब भारत से निकलकर दुनिया के कोने-कोने में मनाए जाने लगा है। वहीं, विश्नोई समाज के लोग होली पर होलिका दहन नहीं करता, न ही रंग गुलाल का उपयोग करता है। इसके पीछे इनकी धार्मिक मान्यताएं हैं। समाज के 29 नियम बने हैं, अधिकांश पर्यावरण संरक्षण से जुड़े हैं। पेड़ों को बचाने के लिए 363 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। उनके अनुयायियों का मानना है कि होली दहन में लकड़ियों का इस्तेमाल होता है और ज्वाला के दौरान सैकड़ों कीट-पतंगें इसमें गिरकर मर जाते हैं, इसलिए समाज के लोग होली दहन के दौरान कहीं ज्वाला भी देखना पसंद नहीं करते। न ही कोई खुशी मनाते हैं। दूसरे दिन सामूहिक हवन के बाद पाहल बनाकर प्रसाद लेते हैं। इसके बाद सादा ‘बाजरा का खीच’ भोजन करते हैं।

राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में रहने वाला विश्नोई समाज इसी तरीके से होली मनाता है। परंपरा के अनुसार विश्नोई समाज के लोग खुद को प्रह्लाद पंथी मानते हैं। जब होली के दिन होलिका भक्त प्रहलाद को लेकर चिता में बैठती है तो उस समय विश्नोई समाज प्रह्लाद के जल जाने की आशंका को लेकर गमगीन हो जाता है, लेकिन जैसे ही दूसरे दिन यानी रामा-श्यामा को होलिका के जल जाने अाैर प्रह्लाद के बच जाने की खबर मिलती है तो खुशी में हवन आदि करते हैं।

न पानी, न रंग-गुलाल

विश्नोई समाज जल सरंक्षण के लिए पानी में रंग या सूखी गुलाल नहीं उड़ाकर रामा-श्यामा के लिए सफेद कपड़ों में एक-दूसरे के घर जाकर होली की बधाइयां देता है। साथ ही समाजजन अपने गुरु जम्भेश्वर के बताए 120 शब्दों का पाठ कर पवित्र ‘पाहल’ बनाते हैं। बाद में सभी को जल के रूप में प्रसादी दी जाती है। यह शुद्धिकरण माना जाता है।

पाहल और हवन गांव के मंदिर या सार्वजनिक स्थान पर होता है। इसमें हर घर से गाय का घी व अनाज लाना अनिवार्य है। इसी घी से सालभर यज्ञ होता है अाैर एकत्रित अनाज से सालभर पक्षियों के लिए चुग्गा होता है।
खबरें और भी हैं...