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म्हने ऐड़ो नहीं चईजे, म्हने वेड़ो नहीं चईजे म्हने सीए चइजे-म्हने सीएए चइजे...

एक वर्ष पहले
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श्लील गायन में कोराेना वायरस से बचाव का देंगे संदेश, सीएए को लेकर तंज कसेंगे

श्लील गायन। यह शब्द आते ही भीतरी शहर की होली पर गेर गायकों की होली याद आ जाती है। श्लील गायन की विरासत को भीतरी शहर में संभाला जा रहा है। जहां आज से दो दशक पहले तक आठ से दस गेर थी, जो होली से लेकर शीतलाष्टमी तक श्लील गायन करती थीं। अब नई पीढ़ी के कम रुझान के चलते गेर की संख्या 4-5 तक सीमित चुकी है। कुछ लोग ही इस परंपरा को विलुप्त होने से बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस बार इन गेरों में कोरोना वायरस को मात देने और इससे बचने का संदेश भी दिया जाएगा। इसमें जोधपुर की सबसे प्रमुख रावजी की गेर के साथ कई मोहल्लों की गेर है जो 625 सालों से लगातार मंडोर में निकाली जा रही है।

मारवाड़ में श्लील गायन की परंपरा रजवाड़ों से रही है। यहां होली के साथ शादी में श्लील गायन होता था, लेकिन आधुनिकता और मोबाइल क्रांति ने परंपरा को नुकसान पहुंचाया है। अब शादी समारोह में डीजे ने जगह ले ली है और होली रस्म अदायगी के तौर पर ही मनाई जाती है। इस कठिन दौर में भी कुछ गेर ऐसी हैं जो इस संस्कृति को बचाने का जद्दोजहद कर रही है। मंडोर से निकलने वाली रावजी की गेर भी इसका एक उदाहरण है। इसके अलावा भीतरी शहर के कुछ मोहल्लों में टीमें हैं, जिस में 40-50 साल के लोग शामिल हैं, तो कुछ में 20 से 35 वर्ष के युवा। जो पुरानी धुनों के साथ नई बॉलीवुड, रॉक, मिक्स गानों की धुनों पर श्लील गालियां लिखते हैं। सबसे बड़ी खासियत यह है कि श्लील गायन सामाजिक कुरीतियों के साथ देश-दुनिया में चल रहे मुद्दों पर लिखी जाती है। इस बार भी कोराेना वायरस, सीएए पर लिखी गई है। भीतरी शहर में रंग-रंगीला फाग, आवती गेर और मोहन बेली फाग की ओर से स्टेज शो होगा। इसके अलावा भी कई गेर है जो होली पर निकलती है।

आवती गेर


पहले इसका नाम मंडलेश्वर फाग था, जिसे इस बार बदल दिया गया है। कोराेना वायरस पर श्लील गायन किया जाएगा। फाग के ललित मत्तड़ ने बताया कि जबरनाथ महादेव मंदिर में होली से 10-15 दिन पहले से तैयारी शुरू कर दी है। इस बार बॉलीवुड गानों के साथ परंपरागत धुनों पर भी श्लील गायन किया जाएगा। यह फाग मंडली गेर के रूप में नवचौकिया, भीमजी की हथाई और जालप मोहल्ला में जाकर गायन करेगी। गायन के लिए गालियां मुरली मनोहर बोड़ा व अनिल जोशी ने लिखी हैं।


रंग- रंगीलो फाग


फाग के नरेश बोहरा ने बताया कि इस वर्ष होली पर श्लील गायन के प्रेरणा स्रोत ओपी व्यास, कृपाकिशन एवं दाऊलाल जोशी की श्रद्धांजलि एवं स्वरांजलि के साथ किया जाएगा। पहली प्रस्तुति होली पर यानी सोमवार को रात 8 बजे चौपासनी मंदिर के पास, 10 मार्च को शहर के भीतरी क्षेत्र स्थित परंपरागत मंचों पर दी जाएगी। यह फाग वर्ष 2001 से लगातार श्लील गायन कर रही है। सिवांची गेट स्थित शिवदत्त स्मारक में यह प्रेक्टिस करते हैं। टीम के सदस्य विनोद व्यास ने बताया कि मुख्य सिंगर नरेश बोहरा है।

रावजी की गेर


मोहन बेली फाग


मंडोर में पिछले 625 सालों से यह पारंपरिक गेर निकाली जा रही है। खोखरिया व मंडावता बेरा से निकलने वाली इस गेर में एक युवक को रावजी का रूप धारण करवाया जाएगा। गेर में सिर्फ श्लील गायन होगा, लेकिन कोरोना वायरस को लेकर यहां कोई मैसेज या जानकारी नहीं दी जाएगी।

जैसा नाम से प्रतीत हाेता है, इसमें लीड सिंगर मोहन बेली और उनके बेटे मनोज बेली इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। हर दो-तीन साल में एक बार यह होली पर फाग की तैयारी करते हैं। इस बार दस मार्च को जूनी मंडी स्थित बाल किशनलाल मंदिर के पास गेर का श्लील गायन होगा। इसमें सीएए पर लिखी ओ मेरी मेहबूबा... थीम पर म्हने ऐड़ो नहीं चईजे, म्हने वेड़ो नहीं चईजे, म्हने सीए चइजे-म्हने सीएए चइजे... का गायन होगा। इसके गीत डॉ. रोबिन पुरोहित ने लिखे हैं, जबकि कार्यकारी अध्यक्ष विनोद व्यास व सचिव अरुण पुरोहित व बेटूसा है। गेर की यह स्वरांजलि दाऊलाल बागस व सिंगर स्व.अशोक घेरवानी को समर्पित होंगी।
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