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अतिक्रमण के नाम पर सिर्फ अपनी जमीनें खाली कराई, सीज बिल्डिंगों को खोलते गए, हाईकोर्ट में कहा- फाइलें गायब

Jodhpur News - पांच साल के भाजपा बोर्ड और महापौर घनश्याम ओझा के कार्यकाल में न तो अवैध निर्माण रुके और न ही अतिक्रमण हटे।...

Nov 22, 2019, 09:00 AM IST
Jodhpur News - rajasthan news in the name of trespassing only their lands were vacated seas were opened to buildings the high court said files missing
पांच साल के भाजपा बोर्ड और महापौर घनश्याम ओझा के कार्यकाल में न तो अवैध निर्माण रुके और न ही अतिक्रमण हटे। अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर सिर्फ शहर के बाहर और नालों की अपनी जमीनें खाली करवाई। आंखों के सामने हो रहे निर्माण और अतिक्रमण हटाने में निगम का बुलडोजर बेदम हो गया। इधर, हाईकोर्ट ने निगम को आवागमन में बाधक अतिक्रमण हटा कर शहर को व्यवस्थित करने के दर्जनों आदेश दे दिए, लेकिन उनकी पालना करना तो दूर 4 जोन में अंडरग्राउंड पार्किंग बनाने का वादा भी ठंडे बस्ते में ही पड़ा है। निगम की एकल खिड़की से जी+1 इजाजत लेकर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने का खेल जोरों पर चल रहा है। निगम ने शहर में ऐसी 200 इमारतें सीज की, लेकिन उन्हें भी शास्ती लेकर मुक्त कर दिया। नई सड़क और घंटाघर के दुकानदार तो निगम के खिलाफ अवमानना याचिका लगा चुके हैं।

अतिक्रमण दस्ते के हाथ बांध दिए, पद भी नहीं भरे

अतिक्रमण| अवैध निर्माण रोकने के लिए निगम में अतिक्रमण दस्ता है। पांच सालों में निरीक्षक पद बढ़ाने की बजाय एक मात्र पद भी खाली हो गया। तीन जोन में प्रभारी भी आधे हैं। पुलिस के एडीसीपी तो हैं, परंतु बिना सिपाहियों की फौज के सेनापति होकर बैठे हैं। मुख्यमंत्री प्रकोष्ठ और लोकायुक्त से आने वाले निर्देशों की ही पालना हो रही है।

सिटी रिपोर्टर | जोधपुर

पांच साल के भाजपा बोर्ड और महापौर घनश्याम ओझा के कार्यकाल में न तो अवैध निर्माण रुके और न ही अतिक्रमण हटे। अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर सिर्फ शहर के बाहर और नालों की अपनी जमीनें खाली करवाई। आंखों के सामने हो रहे निर्माण और अतिक्रमण हटाने में निगम का बुलडोजर बेदम हो गया। इधर, हाईकोर्ट ने निगम को आवागमन में बाधक अतिक्रमण हटा कर शहर को व्यवस्थित करने के दर्जनों आदेश दे दिए, लेकिन उनकी पालना करना तो दूर 4 जोन में अंडरग्राउंड पार्किंग बनाने का वादा भी ठंडे बस्ते में ही पड़ा है। निगम की एकल खिड़की से जी+1 इजाजत लेकर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने का खेल जोरों पर चल रहा है। निगम ने शहर में ऐसी 200 इमारतें सीज की, लेकिन उन्हें भी शास्ती लेकर मुक्त कर दिया। नई सड़क और घंटाघर के दुकानदार तो निगम के खिलाफ अवमानना याचिका लगा चुके हैं।

अतिक्रमण दस्ते के हाथ बांध दिए, पद भी नहीं भरे

अतिक्रमण| अवैध निर्माण रोकने के लिए निगम में अतिक्रमण दस्ता है। पांच सालों में निरीक्षक पद बढ़ाने की बजाय एक मात्र पद भी खाली हो गया। तीन जोन में प्रभारी भी आधे हैं। पुलिस के एडीसीपी तो हैं, परंतु बिना सिपाहियों की फौज के सेनापति होकर बैठे हैं। मुख्यमंत्री प्रकोष्ठ और लोकायुक्त से आने वाले निर्देशों की ही पालना हो रही है।

निगम बोर्ड और मेयर के 5 साल

आज अवैध निर्माण-कब्जे का ऑडिट

न अतिक्रमण तोड़े न अवैध निर्माण रोके, सीज बिल्डिंग को बनाया कमाई का जरिया

बेशकीमती भूखंड के लिए खुद पार्टी बन गए

महापौर ओझा शहर के एक भूखंड को लेकर कोर्ट में व्यक्तिगत पार्टी बन गए, ऐसा पहली बार हुआ। शास्त्रीनगर में जैन फैमिली ट्रस्ट को भूखंड आवंटित था, उसमें कोई विवाद हो गया। तर्क यह कि वे निगम का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए पार्टी बने हैं, इरादा यही था तो महापौर पार्टी बनते न की घनश्याम ओझा।

नक्शे विरुद्ध बनी बिल्डिंग सीज करेंगे


अतिक्रमण को लेकर एसीबी तक लड़ाई लड़ी : ओझा


हैरानी! जहां हर वार्ड में औसत 10 बिल्डिंग बन रही है, वहां 5 साल में 217 मकानों पर दे दी मल्टी स्टोरी बनाने की इजाजत।

कमाई के लिए 150 घर उजाड़े, कोर्ट के स्टे से थमे

कालीबेरी में 125 घर तोड़े, परंतु स्टे आ गया तो जमीन हाथ से निकल गई। ऐसे ही भैरव नाला पर 15 मकान तोड़े कॉमर्शियल भूखंड बेचने की प्लानिंग थी। 35 का ले-आउट बनाया, लेकिन बेच एक भी नहीं पाए। हाउसिंग बोर्ड की 55 बीघा जमीन पर कब्जा किया तो बोर्ड ने उसे भी चुनौती दे डाली। लाल पुलिया व तारघर के सामने की जमीन खाली करवा कर 7 करोड़ जरूर कमा लिए।

5-5 लाख पेनल्टी वसूल सीज मुक्त कर दीं बिल्डिंग्स

शहर में अवैध 200 बिल्डिंग सीज की थी। निगम ने अधिकांश से 5-5 लाख रुपए पेनल्टी वसूल सीज मुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने ऐतराज कर रिपोर्ट मांगी तो कहा- फाइलें गायब हो गईं। अब कोई भी बिल्डिंग कोर्ट की इजाजत के बिना सीज मुक्त नहीं होगी। इसलिए 10 बिल्डिंग सीज हैं।

फुटपाथ के अतिक्रमण भी शास्ती लेकर छोड़ दिए

पांच सालों में निगम ने सात बार फुटपाथ के अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया और 100 गाड़ी सामान जब्त किया। यह सामान शास्ती लेकर छोड़ दिया और सभी अतिक्रमण फिर से हो गए। कोर्ट में कहते हैं कि 4000 चबूतरियां तोड़ी हैं, परंतु आवागमन तो फिर भी सुगम नहीं हुआ, इसलिए चबूतरियां तोड़ने पर भी सवालिया निशान लगाए गए।

पार्किंग बनाई नहीं, फुटपाथ भी किराए पर चढ़ा दिए

शहर के 4 जोन में सरदारपुरा, रावण का चबूतरा, आशापूर्णा मॉल व नई सड़क पर अंडरग्राउंड पार्किंग बनाने की योजनाएं बनाईं। सरदारपुरा का ही काम हुआ। नई सड़क का काम विवाद में अटका, रावण का चबूतरा शुरू नहीं और आशापूर्णा की पार्किंग ठंडे बस्ते में गई। स्टेशन के पास फुटपाथ तिब्बतियों व कार टैक्सी वालों को किराए पर दे दिए। एम्स के बाहर व प्रतापनगर में सड़कों पर स्टैंड बिना किराए चढ़ा दिए।

एक्सपर्ट

Q. क्या एक भूखंड के लिए व्यक्तिगत पार्टी बनने को सही मानते हैं?

A. अगर किसी मामले में निगम को बड़ा नुकसान होता नजर आता है। प्रशासन रूचि नहीं लेता है तो फिर मुखिया को आगे आना ही चाहिए।

रामेश्वर दाधीच, पूर्व महापौर। ये भी 4 साल अपनी सरकार में मेयर रहे

Q. अवैध निर्माण को रोकने में नाकामी पर क्या कहेंगे?

A. इसमें इच्छाशक्ति महत्वपूर्ण होती है। हालांकि कभी-कभी सिस्टम साथ नहीं देता है, लेकिन इसके लिए प्रभावी मॉनिटरिंग की जरूरत है।

Q. पांच साल में बोर्ड कितना सफल हुआ?

A. फिफ्टी-फिफ्टी है। फिर भी इसके लिए मुखिया नहीं, सिस्टम दोषी है।

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