हिंदी-राजस्थानी व उर्दू के शब्दों में खिले रंग, होली खेलंे प्रेम और सौहार्द्र के संग
शफ़क़ - लालिमा
धनक -इन्द्रधनुष
बे-शरर -बग़ैर
चिंगारी
हेत री होळी में...
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हर नजर रंग है...
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ता उम्र रहेंगे रंगों के साथ
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आभै उडै गुलाल, हेत री होळी में।
फूल खिल्या है लाल, हेत री होळी में।।
ऊजळ धोरांरेत, ऊछळै आभै तक।
भरिया छीलरताल, हेत री होळी में।।
रोहिड़ै रा फूल, दहकता मदमाता।
जोवै उभी जाळ, हेत री होळी में।।
रात अरु परभात, चमकतौ औ दिनड़ौ।
व्हैग्या मालामाल, हेत री होळी में।।
पिचकारी ले कान्ह, बिरज री गळी-गळी।
दीनौ रंग उछाळ, हेत री होळी में।।
भींज्या राधा चीर, प्रीत रा पळका है।
बीखरिया है बाळ, हेत री होळी में।।
जोवै गढ़ मेहराण, आपरी गळी-गळी।
भूल्यौ सूरज चाल, हेत री होळी में।।
नागादड़ी, मण्डोर, झील इण कायलाणै।
अंजस, ओज, उबाळ, हेत री होळी में।।
सड़कां घेर घुमेर, गगन में अै चीलां।
जोधाणै री ढ़ाल, हेत री होळी में।।
आंख्यां में तप तेज, उड़ै रंग केसरियौ।
खेजड़ली री डाळ, हेत री होळी में।।
भाईचारै री भींत, अड़ी है असमानां।
मिनखपणौ खुशहाल, हेत री होळी में।।
इस हवा में घुला हर हुनर रंग है
आज तो ख़ुशबुओं का नगर रंग है
क्या शफ़क़ क्या धनक छांव तक है चटक
धूप में बनते हर रंग पर रंग है
चित चिनारों में क्या घुल गए हैं सभी
बे-शरर आग से तेज़-तर रंग है
पैरहन ख़ुशबुओं ने बदल कर कहा
शहर मौसम है अपना तो घर रंग है
शक्लो-सूरत कोई साफ़ दिखती नहीं
रंग पर रंग है, रंग पर रंग है
दौड़ती टोलियां भागती शोख़ियां
खिलखिलाती हुई हर नज़र रंग है
गीत खुशबू भरे फूल नग़मा खिले
आज तो बस इधर से उधर
रंग है।
जोधपुर| क्योंकि...शहर परंपरा से परिपूर्ण है। क्योंकि...यहां जिंदादिली और शौर्य के रंगों की बारिश होती है। क्योंकि...मेहरानगढ़ की प्राचीर से घंटाघर के गलियारों में पत्थर बोलते हैं। क्योंकि...हम राग-रंग-उल्लास के त्योहार को एक-दूसरे के साथ जीते हैं। क्योंकि... हमारा रहन-सहन और भाषा अलग है, मगर राजस्थानी, हिंदी और उर्दू जबान हमारी संकीर्णता की सीमाओं को तोड़ देती है। क्योंकि... यह शहर शब्द शिल्पियों और आखर प्रेमियों का है।...ऐसे में होली का पर्व हमारे लिए प्रेम और सौहार्द्र का संदेश लेकर आया है...इसका स्वागत करते हुए हम यहां शहर के तीन प्रख्यात रचनाकारों की तीन भाषाओं में लिखी कविता-गजल से शहरवासियों का स्वागत करते हैं। शब्दों की अबीर-गुलाल अब बरसी है तो हमारे तन-मन-आंगन को भीतर तक भिगो रही है...होली की शुभकामना....।
आज सभी रंग हैं
प्रीत की थाली में
इन रंगों ने
सोच रखा है शायद
कि करना है
एक गाल
को गुलाल!
महकना है
उस तन पर
बन कर प्रेम
जो है इंतज़ार में
पिछली कई होली से
पिसते वक़्त
गुलाल ने
ठाना था ख़ुद में
कि अपने
महीन एहसास से
भर देना है
वक़्त की बोझिल
लकीरों को
जो पाटती हैं
तुमको मुझसे
ये रंग-रंग नहीं हैं
ये मेरा प्यार है
जिससे तुमको
करना है सराबोर
इस बार का
लगा ये रंग
छूटेगा नहीं
किसी पानी से
वक़्त भी नहीं
उतार पाएगा ये रंग
तुम्हारे बदन से
अब ताउम्र
हम तुम रहेंगे
इन रंगों के साथ
इश्राक़ुल इस्लाम माहिर
आईदानसिंह भाटी
रेणू वर्मा