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पाक के साथ 1971 का युद्ध और गोवा मुक्ति आंदोलन के हीरो लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह का जन्म शताब्दी समारोह

एक वर्ष पहले
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कर्नल दिग्विजयसिंह

1971 की बात है। लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह भारतीय सेना की तेजपुर स्थित 4 कोर के कमांडर थे। उस दौरान सेना में कमिशन मिलने के बाद मैं 6 राजपूत रेजिमेंट में बतौर सैकंड लेफ्टिनेंट तैनात था। कई महीनों पहले युद्ध की तैयारियां शुरू हो गई थीं। जनरल सिंह हर यूनिट के सैनिकों व अफसरों का हौसला बढ़ाने के लिए पत्र लिखते थे। वे खास तौर पर डर भगाने का कहते थे ‘मुझे नहीं पता कि डर क्या है।’ उस दौरान त्रिपुरा में मेघना नदी के पास हेलिबोर्न ऑपरेशन की तैयारियां शुरू की गई। उस दौरान बांग्लादेशी शरणार्थी त्रिपुरा में पहुंचे थे। उनकी मदद से बांग्लादेश जाने के लिए सामरिक महत्व के पुल का निर्माण कराया गया। इसके बाद भारतीय सेना के एक लाख सैनिकों के साथ 30 हजार टन हथियार व गोला बारूद पहुंचाया गया। जनरल साहब मेघना नदी के किनारे हेलिकॉप्टर लैंडिंग स्थलों का जायजा ले रहे थे, तब पाकिस्तानी सैनिकों ने हेलिकॉप्टर पर 64 राउंड फायर किए। पायलट घायल हो गया और को-पायलट ने अगरतला में सुरक्षित लैंडिंग की। इसके तुरंत बाद वे तैयारियों का जायजा लेने दुबारा हेलिकॉप्टर से निकल पड़े। सबसे बड़ा कमाल यह था कि चार किलोमीटर चौड़ी मेघना नदी को हेलिकॉप्टर्स से एयरोब्रिज बनाकर पार कर लिया। सेना के पास एमआई 4 हेलिकॉप्टर थे और रात में लैंडिंग नहीं हो सकती थी। ज्यादा सैनिकों को मेघना नदी पार करवाने के लिए केरोसिन की रोशनी वाले हेलिपेड बनाए गए। सिर्फ आठ सैनिकों की क्षमता वाले एमआई 4 हेलिकॉप्टर की कई ट्रिप करवाकर पूरी ब्रिगेड को जनरल ने मेघना नदी पार करवाकर पहुंचा दिया। तैयारियां पूरी होने के बाद दूसरी ओर एयरफोर्स व नेवी से बेहतर तालमेल जारी था। इस बीच अमेरिकी नेवी का जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में पहुंचा, उससे पहले ही जनरल ने ढाका को घेर लिया। ढाका शहर के एयरफोर्स स्टेशन के रनवे को हमारी एयरफोर्स लड़ाकू विमानों ने नष्ट कर दिया। इसके चलते पाकिस्तानी फाइटर उड़ नहीं सके। इधर ढाका शहर को घेरकर जनरल सिंह ने इसके चारों ओर 36 आर्टिलरी गन (तोप) तैनात कर दी। चेतावनी फायर होते ही पाकिस्तान सेना ने सफेद झंडे दिखाकर युद्ध रोकने के लिए कहा। ढाका के एयरफोर्स स्टेशन पर जनरल सिंह पहुंचे और पाकिस्तानी सेना के एएके जनरल नियाजी को आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया। इससे पहले जनरल नियाजी सिर्फ युद्ध विराम को ही तैयार थे, लेकिन जनरल सिंह ने ही उन्हें 98 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के साथ सरेंडर करने को मजबूर किया। इसके चलते ही जनरल अरोड़ा के सामने नियाजी ने समर्पण किया। युद्ध के बाद बहुत शरणार्थी आ गए। भारत में आने के लिए भगदड़ नहीं मचे, इसके लिए पहले बारूदी सुरंगें हटाई गईं। शरणार्थियों को कैंप में रखा गया।

(लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में 1971 का युद्ध लड़ चुके कर्नल दिग्विजयसिंह ने भास्कर के रिपोर्टर डीडी वैष्णव को ढाका जीतने व पाकिस्तानी के आत्मसमर्पण की कहानी बताई।)

ढाका को 36 तोप से घेरा और लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह ने फायर की चेतावनी दी, तब 98 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने किया था समर्पण
कर्नल दिग्विजयसिंह

1971 की बात है। लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह भारतीय सेना की तेजपुर स्थित 4 कोर के कमांडर थे। उस दौरान सेना में कमिशन मिलने के बाद मैं 6 राजपूत रेजिमेंट में बतौर सैकंड लेफ्टिनेंट तैनात था। कई महीनों पहले युद्ध की तैयारियां शुरू हो गई थीं। जनरल सिंह हर यूनिट के सैनिकों व अफसरों का हौसला बढ़ाने के लिए पत्र लिखते थे। वे खास तौर पर डर भगाने का कहते थे ‘मुझे नहीं पता कि डर क्या है।’ उस दौरान त्रिपुरा में मेघना नदी के पास हेलिबोर्न ऑपरेशन की तैयारियां शुरू की गई। उस दौरान बांग्लादेशी शरणार्थी त्रिपुरा में पहुंचे थे। उनकी मदद से बांग्लादेश जाने के लिए सामरिक महत्व के पुल का निर्माण कराया गया। इसके बाद भारतीय सेना के एक लाख सैनिकों के साथ 30 हजार टन हथियार व गोला बारूद पहुंचाया गया। जनरल साहब मेघना नदी के किनारे हेलिकॉप्टर लैंडिंग स्थलों का जायजा ले रहे थे, तब पाकिस्तानी सैनिकों ने हेलिकॉप्टर पर 64 राउंड फायर किए। पायलट घायल हो गया और को-पायलट ने अगरतला में सुरक्षित लैंडिंग की। इसके तुरंत बाद वे तैयारियों का जायजा लेने दुबारा हेलिकॉप्टर से निकल पड़े। सबसे बड़ा कमाल यह था कि चार किलोमीटर चौड़ी मेघना नदी को हेलिकॉप्टर्स से एयरोब्रिज बनाकर पार कर लिया। सेना के पास एमआई 4 हेलिकॉप्टर थे और रात में लैंडिंग नहीं हो सकती थी। ज्यादा सैनिकों को मेघना नदी पार करवाने के लिए केरोसिन की रोशनी वाले हेलिपेड बनाए गए। सिर्फ आठ सैनिकों की क्षमता वाले एमआई 4 हेलिकॉप्टर की कई ट्रिप करवाकर पूरी ब्रिगेड को जनरल ने मेघना नदी पार करवाकर पहुंचा दिया। तैयारियां पूरी होने के बाद दूसरी ओर एयरफोर्स व नेवी से बेहतर तालमेल जारी था। इस बीच अमेरिकी नेवी का जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में पहुंचा, उससे पहले ही जनरल ने ढाका को घेर लिया। ढाका शहर के एयरफोर्स स्टेशन के रनवे को हमारी एयरफोर्स लड़ाकू विमानों ने नष्ट कर दिया। इसके चलते पाकिस्तानी फाइटर उड़ नहीं सके। इधर ढाका शहर को घेरकर जनरल सिंह ने इसके चारों ओर 36 आर्टिलरी गन (तोप) तैनात कर दी। चेतावनी फायर होते ही पाकिस्तान सेना ने सफेद झंडे दिखाकर युद्ध रोकने के लिए कहा। ढाका के एयरफोर्स स्टेशन पर जनरल सिंह पहुंचे और पाकिस्तानी सेना के एएके जनरल नियाजी को आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया। इससे पहले जनरल नियाजी सिर्फ युद्ध विराम को ही तैयार थे, लेकिन जनरल सिंह ने ही उन्हें 98 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के साथ सरेंडर करने को मजबूर किया। इसके चलते ही जनरल अरोड़ा के सामने नियाजी ने समर्पण किया। युद्ध के बाद बहुत शरणार्थी आ गए। भारत में आने के लिए भगदड़ नहीं मचे, इसके लिए पहले बारूदी सुरंगें हटाई गईं। शरणार्थियों को कैंप में रखा गया।

(लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में 1971 का युद्ध लड़ चुके कर्नल दिग्विजयसिंह ने भास्कर के रिपोर्टर डीडी वैष्णव को ढाका जीतने व पाकिस्तानी के आत्मसमर्पण की कहानी बताई।)

जोधपुर
ले.ज. नियाजी को समर्पण करने ले जाते सगतसिंह। पाक के समर्पण के ऐतिहासिक क्षणों में मौजूद सिंह। बांग्लादेश में उनका भव्य स्वागत हुआ।

कर्नल दिग्विजयसिंह

1971 की बात है। लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह भारतीय सेना की तेजपुर स्थित 4 कोर के कमांडर थे। उस दौरान सेना में कमिशन मिलने के बाद मैं 6 राजपूत रेजिमेंट में बतौर सैकंड लेफ्टिनेंट तैनात था। कई महीनों पहले युद्ध की तैयारियां शुरू हो गई थीं। जनरल सिंह हर यूनिट के सैनिकों व अफसरों का हौसला बढ़ाने के लिए पत्र लिखते थे। वे खास तौर पर डर भगाने का कहते थे ‘मुझे नहीं पता कि डर क्या है।’ उस दौरान त्रिपुरा में मेघना नदी के पास हेलिबोर्न ऑपरेशन की तैयारियां शुरू की गई। उस दौरान बांग्लादेशी शरणार्थी त्रिपुरा में पहुंचे थे। उनकी मदद से बांग्लादेश जाने के लिए सामरिक महत्व के पुल का निर्माण कराया गया। इसके बाद भारतीय सेना के एक लाख सैनिकों के साथ 30 हजार टन हथियार व गोला बारूद पहुंचाया गया। जनरल साहब मेघना नदी के किनारे हेलिकॉप्टर लैंडिंग स्थलों का जायजा ले रहे थे, तब पाकिस्तानी सैनिकों ने हेलिकॉप्टर पर 64 राउंड फायर किए। पायलट घायल हो गया और को-पायलट ने अगरतला में सुरक्षित लैंडिंग की। इसके तुरंत बाद वे तैयारियों का जायजा लेने दुबारा हेलिकॉप्टर से निकल पड़े। सबसे बड़ा कमाल यह था कि चार किलोमीटर चौड़ी मेघना नदी को हेलिकॉप्टर्स से एयरोब्रिज बनाकर पार कर लिया। सेना के पास एमआई 4 हेलिकॉप्टर थे और रात में लैंडिंग नहीं हो सकती थी। ज्यादा सैनिकों को मेघना नदी पार करवाने के लिए केरोसिन की रोशनी वाले हेलिपेड बनाए गए। सिर्फ आठ सैनिकों की क्षमता वाले एमआई 4 हेलिकॉप्टर की कई ट्रिप करवाकर पूरी ब्रिगेड को जनरल ने मेघना नदी पार करवाकर पहुंचा दिया। तैयारियां पूरी होने के बाद दूसरी ओर एयरफोर्स व नेवी से बेहतर तालमेल जारी था। इस बीच अमेरिकी नेवी का जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में पहुंचा, उससे पहले ही जनरल ने ढाका को घेर लिया। ढाका शहर के एयरफोर्स स्टेशन के रनवे को हमारी एयरफोर्स लड़ाकू विमानों ने नष्ट कर दिया। इसके चलते पाकिस्तानी फाइटर उड़ नहीं सके। इधर ढाका शहर को घेरकर जनरल सिंह ने इसके चारों ओर 36 आर्टिलरी गन (तोप) तैनात कर दी। चेतावनी फायर होते ही पाकिस्तान सेना ने सफेद झंडे दिखाकर युद्ध रोकने के लिए कहा। ढाका के एयरफोर्स स्टेशन पर जनरल सिंह पहुंचे और पाकिस्तानी सेना के एएके जनरल नियाजी को आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया। इससे पहले जनरल नियाजी सिर्फ युद्ध विराम को ही तैयार थे, लेकिन जनरल सिंह ने ही उन्हें 98 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के साथ सरेंडर करने को मजबूर किया। इसके चलते ही जनरल अरोड़ा के सामने नियाजी ने समर्पण किया। युद्ध के बाद बहुत शरणार्थी आ गए। भारत में आने के लिए भगदड़ नहीं मचे, इसके लिए पहले बारूदी सुरंगें हटाई गईं। शरणार्थियों को कैंप में रखा गया।

(लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में 1971 का युद्ध लड़ चुके कर्नल दिग्विजयसिंह ने भास्कर के रिपोर्टर डीडी वैष्णव को ढाका जीतने व पाकिस्तानी के आत्मसमर्पण की कहानी बताई।)

पर्यटक बोला- आपने गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया, वहां आप पर 10 हजार डॉलर का इनाम
गोवा को पुर्तगाल से मुक्त कराने के ऑपरेशन का नेतृत्व भी जनरल सिंह ने किया था। उस समय वे आगरा स्थित पैरा ब्रिगेड के ब्रिगेडियर थे। जून 1962 के बाद उनकी ब्रिगेड ऑपरेशन पूरा कर वापस आगरा लौट गई। उस दौरान आगरा की एक होटल में जनरल सिंह गए। वहां एक अमेरिकी पर्यटक ने उनसे पूछा- क्या वे ब्रिगेडियर सगतसिंह हैं। इस पर उन्होंने हां में जवाब दिया। जनरल ने उससे पूछा कि वह क्यों पूछ रहा है। तब पर्यटक ने कहा कि वह पुर्तगाल घूमने गया था, वहां आपके पोस्टर लगे हुए हैं और आपको पकड़कर लाने पर दस हजार डॉलर का इनाम मिलेगा। इस पर जनरल ने कहा- क्या मैं आपके साथ पुर्तगाल चलूं, तो पर्यटक ने कहा- हम तो अभी वहां से आए हैं।

नाथूला में चीनी सेना के मंसूबे नाकाम किए
1967 में सिक्किम स्थित नाथूला पास में चीनी सेना ने हमला किया था। सगतसिंह के साथ सेना ने उनका कड़ा मुकाबला किया। घमासान युद्ध कर उन्होंने चीन के नापाक मंसूबों को नाकाम कर दिया। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भी चीन ने पाकिस्तान की सहायता के लिए भारतीय बॉर्डर पोस्ट पर हमले किए। तत्कालीन मेजर जनरल सगतसिंह के नेतृत्व में सेना ने इन्हें भी नाकाम किया था।

मिजोरम में विद्रोहियों का दमन किया
1967 के समय में मिजोरम में विद्रोहियों का बड़ा दबदबा था। सगतसिंह ने विद्रोहियों के विरुद्ध बड़े नियोजित तरीके से कार्यवाही की। उन्होंने क्षेत्र में गांवों के पुनर्गठन को भी मुस्तैदी से किया।

25 की उम्र में कैप्टन बेटे की मौत
सगतसिंह के एक पुत्र दिग्विजय सिंह भी सेना में कैप्टन थे। 1975 में पूंछ में जीप पलटने से उनका देहांत हो गया था।

मेघना नदी से मिशन शुरू किया, बंगले व पोती का नाम इसी पर: तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान व वर्तमान बांग्लादेश के खिलाफ सफल सैन्य युद्ध की शुरुआत मेघना नदी को पार करके हुई थी। इससे प्रभावित होकर सगतसिंह ने जयपुर में अपने बंगले का नाम मेघना हाउस रखा। साथ ही उन्होंने अपनी एक पोती का नाम भी मेघना रखा। ऐसा कहा जाता है कि विश्व के विभिन्न देशों के सैन्य संस्थानों में जब नए रंगरूटों को ट्रेनिंग दी जाती है तो उसमें सगतसिंह की लड़ाइयों और उनके योगदान काे भी बताया जाता है।

(जैसा लेफ्टिनेंट जनरल सगतसिंह के भतीजे रणवीरसिंह ने भास्कर को बताया।)

जोधपुर, बुधवार 17 जुलाई, 2019 |

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