जिस पर मेरी आंखों ने मोती बिछाए रात भर, भेजा तुझे कागज वही, लिखा हमने कुछ भी नहीं...

Jodhpur News - प्रभा खेतान फाउंडेशन और एहसास विमन ऑफ जोधपुर के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को कलम सीरीज के तहत लेखक व बॉलीवुड...

Bhaskar News Network

Jun 14, 2019, 09:00 AM IST
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प्रभा खेतान फाउंडेशन और एहसास विमन ऑफ जोधपुर के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को कलम सीरीज के तहत लेखक व बॉलीवुड फिल्मों के गीतकार इरशाद कामिल शहरवासियों से रूबरू हुए। होटल ताज हरि महल में आयोजित इस प्रोग्राम में साहित्यप्रेमियों के साथ साथ युवाओं ने भी शिरकत की। संस्था की सुषमा नीरज सेठिया ने उनका परिचय अनूठे अंदाज में दिया। कहा, इरशाद कामिल गीतकारी के सुल्तान है। उनके गीतों में ना सिर्फ शब्द जिंदा होते हैं बल्कि उनके एहसासों की कोमलता और विचारों की गहराई श्रोताओं के साथ एक नाजुक-सा रिश्ता बना लेती है। बॉलीवुड की हिट फिल्में जीरो, टाइगर जिंदा है, जब हैरी मैट सेजल, सुल्तान, तमाशा, आशिकी 2, हाईवे, रॉकस्टार और जब वी मैट जैसी कई फिल्मों के गीत कामिल की कलमकारी का बेहतरीन उदाहरण हैं। सेठिया ने बताया, कामिल अब तक चार किताबें लिख चुके हैं। इस मौके पर कामिल की हालिया प्रकाशित पुस्तक "काली औरत का ख्वाब' पर भी बातें हुईं। इस बुक में उन्होंने अपने गीतों के पीछे की कहानियों और स्ट्रगल को बयां किया है। कामिल ने इससे जुड़ा एक शेर भी सुनाया, "सोचा नहीं अच्छा बुरा, देखा सुना कुछ भी नहीं/मांगा खुदा से रात दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं/ जिस पर मेरी आंखों ने मोती बिछाए रात भर/भेजा तुझे कागज वही, लिखा हमने कुछ भी नहीं।' अंत में कामिल ने अपने कई गीतों और फिल्मों के पीछे की कहानियां भी शेयर की। कहा, श्रोता गीत तो सुनते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि किस प्रकार ये चार मिनट का गीत बनता है और कितने दौर से गुजरकर पब्लिक के पास जाता है। इसलिए "काली औरत का ख्वाब' में मैंने अपने गीतों के पीछे की कहानियां बताई हैं। इस मौके दर्शकों के सवालों के कामिल ने रोचक अंदाज में जवाब दिए। गीतकार कामिल को संस्था की ओर से सम्मानित भी किया गया।

पंजाबी मेरी माशूका है, हिंदी में पीएचडी की, उर्दू घर की भाषा है, खुद को समझदार दिखाने और साबित करने के लिए अंग्रेजी बोलना जरूरी है

शैलजा: आपने पोइट्री बैंक बनाया, रिपोर्टर रहे, कविताओं में पीएचडी की और आपके गीतों में सौंधी मिट्‌टी की खुशी और सादगी का एहसास है तो आपकी नजर में कामिल क्या है?

कामिल: पेशन, एग्रेशन और एक्सप्रेशन का नाम कामिल है। इन सबसे भरा मेरा दिल है और कामिल जिंदगी को उस तरह व उस पहलू को देखता है जो किसी और को ना तो दिखाई देता है और ना ही वो देख सकता है। मैंने डर कर कुछ नहीं किया, लेकिन मेरा मानना है कि एहसास ही किसी रचना को जिंदा रखता है। मैं एहसास डालने के लिए उस किरदार को निभाता हूं इसलिए पीढ़ियों के अंतराल को मैंने अपने गीतों में तोड़ने का काम किया है।

शैलजा: आपके गीत यूथ की पहली पसंद बने हुए हैं। आप हर वर्ग को किस तरह गीतों के माध्यम से छू पाते हैं?

कामिल: मैं कभी भी आगे वाले को या अपने से छोटे को कम समझदार नहीं समझता। जिस प्रकार आज यूथ को जल्दी से कह दिया जाता है कि तुम्हें अभी कुछ नहीं पता चुप रहो... तुमने अभी दुनिया नहीं देखी। मेरा मानना है कि आज का यूथ वो है जिसकी मुठ्‌ठी में दुनिया है। पहले के लोग उम्र गुजारकर सीखते थे। आज का यूथ हर क्षेत्र में समझ रखता है और उस तबके को अपनी बात गीतों के जरिए पहुंचाना मेरा मकसद है। मेरा यूथ समझ रहा है और वो बहुत समझदार है। उन्हें बेफकूफ समझना हमारी नासमझी है।

शैलजा: अाप अपने गीतों में पंजाबी, हिंदी और उर्दू तीनों भाषाओं का समावेश कर किस प्रकार गीत लिखते हैं?

कामिल: दरअसल पंजाबी मेरी माशूका है। वहां मैं पैदा हुआ और वहां की मिट्‌टी से खेला-बड़ा हुआ। हिंदी में पीएचडी की और उर्दू घर की भाषा है लेकिन खुद को समझदार दिखाने और साबित करने के लिए अंग्रेजी बोलना जरूरी है। इसलिए मैं भी खुद को पढ़ा-लिखा साबित करने के लिए अंग्रेजी का यूज कर लेता हूं। "जब वी मैट' का गीत "मौजा ही मौजा...' में पंजाब की खुशबू और "जग ढूंढया मै तेरा जेडा...' गीत में हरियाणा की खुशबू ने इन्हें पहचान दिलाई। भाषा पर अधिकार से पब्लिक और क्षेत्र तक पहुंचा जा सकता है। मेरी नजर में दिल शायद खामोश झील है, अगर भाषा पर कमांड होगा तो एक्सप्रेशन अपने आप गीतों में आएंगे।

शैलजा: आप लेखनी में तीनों भाषाओं का यूज करते हैं और नॉलेज रखते हैं तो क्या आपको लगता है कि बॉलीवुड में आपको गीतकार के रूप में अलग दर्जा मिलेगा?

कामिल: भाषा ही नहीं, बल्कि मेरे एक्सप्रेशन भी अलग है। गीत सुनकर लाेगों को ये एहसास हो जाता है कि ये गीत कामिल ने लिखा है। यही मुझे अलग करता है।

शैलजा: स्कूल में आपकी लेखनी मशहूर थी और टीचर आपके लेख की प्रशंसा किया करती थीं तो आपको लेखन के लिए क्या इंस्पायर करता है?

कामिल: मुझे कुछ इंस्पायर नहीं करता। बस, लिखने का शौक है और लेखक हमेशा अधूरेपन को भरने का काम करता है। समाज में किस चीज को किस तरह मुकम्मल किया जाए, ये हर लेखक की चाहत होती है। मैं रास्ता बन गया था तो ठहरा रहा वहीं पर, तेरे पैर बन गया हूं तो चलता रहा हूं, बस इसी तरह कलम के जरिए एक अधूरेपन को पूरा करने की कोशिश करता हूं।

शैलजा: आपने बॉलीवुड में जाने का फैसला कैसे किया और कब एहसास हुआ कि आप गीत लिख सकते हैं?

कामिल : दरअसल फैसला तो जल्दी में लिया जाता है और मौत हमेशा धीरे-धीरे आती है तो मेरा ये फैसला भी जल्दी का था। चंडीगढ़ में फिल्म डायरेक्टर लेख टंडन की फिल्म की शूटिंग चल रही थी और मै बतौर रिपोर्टर उनका इंटरव्यू लेने गया। लेकिन उन्हें किसी स्क्रिप्ट राइटर की जरुरत थी और किसी ने मेरा नाम सुझाया तो मेरी स्क्रिप्ट सराही गई और मैं दिन में उनके साथ शूटिंग का काम और बाद में ऑफिस का रिपोर्टिंग का काम करने लगा। बाइस दिन की इस शूटिंग के बाद उन्होंने मेरा मुंबई का टिकट करवाया। मैंने जॉब छोड़ी और मुंबई आ गया।

शैलजा: बॉलीवुड में गीत लिखना कठिन है क्योंकि धुन पहले बना दी जाती है और गीत बाद में, तो किस प्रकार ये प्रक्रिया मैनेज होती है?

कामिल: बिल्कुल, बहुत कठिन होता है सिचुएशन और धुन को जानकर गीत व शब्दों को देना बहुत कठिन होता है। कई बार तो कुछ गीतों ने तो बहुत परेशान किया। जैसे "भारत' फिल्म का गीत बेख्याली भी कठिन धुन पर ही लिखा है, लेकिन बहुत हिट हुआ है।

शैलजा: पोइट्री बैंड की कल्पना कैसे आई।

कामिल: आज जब सोशल मीडिया पर देखते हैं तो 60 परसेंट लोग कवि बने हुए हैं तो उनकी फीलिंग्स तो हैं लेकिन माेबाइल उनके एक्सप्रेशन खत्म कर रहा है क्योंकि एक के बाद एक नॉलेज है और वो किसी एक को जी नहीं पा रहे हैं। इसलिए उन्हें पोइट्री के जरिए वो देना चाहता हूं। जो वो महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन लिख नहीं पा रहे।

एहसास विमन ऑफ जोधपुर की शैलजा सिंह ने गीतकार इरशाद कामिल से बात की।

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