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पीएचडी डिग्री विवादजेएनवीयू को नहीं मिली राहत खंडपीठ ने खारिज की अपील

एक वर्ष पहले
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जोधपुर| पीएचडी डिग्री विवाद के मामले में एकलपीठ के आदेश के विरुद्ध खंडपीठ पहुंचे जेएनवीयू को राहत नहीं मिली। चीफ जस्टिस इंद्रजीत महांती व जस्टिस पीएस भाटी की खंडपीठ ने जेएनवीयू की विशेष अपील याचिका को खारिज कर राहत देने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता डॉ. एमी अग्रवाल की ओर से अधिवक्ता डाॅ. निखिल डूंगावत व निहार जैन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में बताया गया कि प्रार्थिया व अन्य छात्रों को पहले तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के रेगुलेशन 2009 के अंतर्गत पात्रता प्रवेश परीक्षा से छूट देते हुए एवं उसके एवज में ब्रिज कोर्स करने के बाद शोध कार्य करने दिया गया व डिग्री भी दे दी गई। लेकिन बाद में विश्वविद्यालय द्वारा मनमाने ढंग से एक पक्षीय कार्यवाही करते हुए याचिकाकर्ता व अन्य 300 छात्रों की शोध डिग्री को रेगुलेशन 2009 के समतुल्य नहीं मानने के 29 मई 2017 को आदेश जारी कर दिए। इसके बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नए नियम 2016 जारी किए गए, जिसके द्वारा उन सभी शोध डिग्रीधारियों को असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए अनिवार्य नेट या स्लेट की परीक्षा से छूट प्रदान कर दी गई। यह राहत उन्हीं शोध डिग्रीधारियों को दी गई, जिन्होंने 11 जुलाई 2009 से पहले शोध डिग्री में प्रवेश प्राप्त कर लिया है अथवा शोध डिग्री प्राप्त कर ली है। याचिकाकर्ता विश्वविद्यालय की ओर से 29 मई 2017 को जारी नोटिस की वैधता को चुनौती दी। एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को शोध उपाधि के समतुल्यता प्रमाण-पत्र जारी करने के आदेश दे दिए। इस अंतरिम आदेश को जेएनवीयू ने विशेष अपील याचिका दायर कर हाईकोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी। विवि की ओर से बहस करते हुए कहा गया कि तत्समय विश्वविद्यालय द्वारा खुद के स्तर पर नियमों का उल्लंघन किया गया, इसलिए याचिकाकर्ता समेत इस तरह के सभी अभ्यर्थियों की पीएचडी की डिग्री को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विनियम 2009 के अनुसरण में शोध उपाधि की समतुल्यता नहीं दी जा सकती है। जबकि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इसे अनुचित बताया। दोनों पक्ष सुनने के बाद खंडपीठ ने जेएनवीयू की अपील याचिका खारिज कर राहत देने से इनकार कर दिया।
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