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सप्तमी 15 को, शीतलाष्टमी 16 को मनाएंगे

एक वर्ष पहले
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होली के एक सप्ताह बाद अष्टमी तिथि को आने वाला शीतला अष्टमी का पर्व राजस्थान में ही नहीं पूरे उतरी भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जती ने बताया कि शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता की पूजा करने एवं व्रत रखने से चिकन पॉक्स यानी माता, खसरा, फोड़े, नेत्र रोग नहीं होते है। माता इन रोगों से रक्षा करती है। माता शीतला को मां भगवती का ही रूप माना जाता है तथा अष्टमी के दिन महिलाएं सुबह ठंडे जल से स्नान करके शीतला माता की पूजा – अर्चना करने के बाद पूर्व रात्रि को बनाया गया बासी भोजन से माता को भोग लगाया जाता है। वहीं चैत्र कृष्ण सप्तमी इस बार 15 मार्च को मनाई जावेगी। इस दिन जिले में माता के जागरण व धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हाेगा। वहीं इस दिन घरों में भोजन बनाया जावेगा,जो अगले दिन पूजा- अर्चना और भाेग लगाने के बाद खाया जाएगा। इस दिन घरों में चूला नहीं जलाने की परंपरा है। शीतलाष्टमी का पर्व पूजन,बास्योड़ा 16 मार्च को मनाया जावेगा।

इस दिन घराें में नहीं जलाया जाता है चूल्हा: उन्होंने बताया कि शीतला सप्तमी,शीतला सातम,शीतला अष्टमी,ठंडा –बासी,बास्योड़ा और कई नामों से जाने वाले इस अनूठे त्योहार के दिन पारंपरिक रूप से घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी और कई जगह अष्टमी को यह त्योहार मनाया जाता है। शीतला माता की पूजा-अर्चना और उपासना का यह त्योहार हमारे खान-पान को मौसमानुकूल करने की परंपरा के पालन के लिए है। शीतला माता की पूजा- अर्चना बहुत विधि- विधान से की जाती है और इसमें साफ – सफाई व सुद्धता का बहुत ध्यान रखा जाता है। शीतला सप्तमी या अष्टमी की तैयारी एक दिन पहले से की जाती है। अलग-अलग जगह अलग-अलग तरह के भोजन की परंपरा है। लेकिन दही इस दिन के नेवैद्य का मुख्य पदार्थ होता है। सप्तमी की पूजा करने वाले परिवारों में छठ की शाम और अष्टमी की पूजा करने वाले परिवाराें में सप्तमी की शाम को मीठे चावल,कढ़ी,पकौड़ी,बेसन चक्की,पुए,पूरी,बाजरे की रोटी व सब्जी आदी बनाई जाती है।

रसोई की करें विशेष साफ -सफाई, फिर पूजा-अर्चना: राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जती ने बताया कि ठंडा भोजन खाने के पीछे भी एक धार्मिक मान्यता भी है कि माता शीतला को शीतल, ठंडा व्यंजन और जल पसंद है। इसलिए माता को ठंडा (बासी) व्यंजन का ही भोग लगाया जाता है। ठंडे पानी से स्नान करते हैं और रात में बनाया हुआ बासी भोजन ही करते हैं। इससे माता शीतला प्रसन्न होती है। खाना बनाए जाने वाली रात को खाना बना लेने के बाद रसोईघर की साफ-सफाई फिर से की जाती है पूजा की थाली में रोली, चावल, मौली, पुष्प, वस्त्र आदि अर्पित कर रसाई घर की पूजा करें और फिर उसके बाद अगले दिन चूल्हा नहीं जलाएं। होली के सात दिन बाद चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की सप्तमी को और कई जगह अष्टमी को शीतला व्रत किया जाता है। सर्दी के जाने और गर्मी के आने से पहले की ऋतु वसंत संक्रमण कालीन ऋतु कहलाती है। इसमें प्रकृति भी अनुकूलन करने के लिए परिस्थिति मुहैया कराती है और हमारी परंपराएं भी। होली और शीतला सप्तमी ऐसे ही त्योहार हैं।

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