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रोक के बावजूद 600 करोड़ के सरकारी कार्यों में बजरी का आधिकारिक इस्तेमाल

बजरी पर इन दिनों पूरी तरह से रोक लगी हुई है। मगर सरकार के सबसे बड़े निर्माण विभाग पीडब्ल्यूडी में चल रहे करीब छह सौ...

Danik Bhaskar | Jun 29, 2018, 04:40 AM IST
बजरी पर इन दिनों पूरी तरह से रोक लगी हुई है। मगर सरकार के सबसे बड़े निर्माण विभाग पीडब्ल्यूडी में चल रहे करीब छह सौ करोड़ के निर्माण कार्यों में अधिकारिक तौर पर बजरी का उपयोग किया जा रहा है। हैरत की बात है कि कोई यह पूछने वाला नहीं है कि इन कार्यों के लिए उपयोग में आ रही करीब 12 से 15 डंपर बजरी हर रोज कहां से आ रही है। दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बजरी पर रोक लगाए जाने के बाद विकल्प के तौर पर क्रेशर डस्ट के उपयोग की सलाह दी जा रही है मगर खुद पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने निर्माण ठेकेदारों को अधिकारिक रूप से यह हिदायत दे रखी है कि यदि किसी ने अपने कार्य में इसका उपयोग किया तो उसका भुगतान नहीं किया जाएगा।

भास्कर के सवाल पर अधिकारी बोले-विभाग कार्रवाई कर रहा है

मामले को ऐसे समझें

पीडब्ल्यूडी अजमेर में इन दिनों करीब 579 करोड़ रुपए के 702 निर्माण कार्य प्रगति पर है तथा इनके खुलेआम 14 से 15 डंपर बजरी हर रोज सप्लाई हो रही है। अधिकारियों द्वारा क्रेशर डस्ट के उपयोग पर रोक लगाए लगाने से मजबूरी में काला बाजारी से बजरी खरीदने को विवश है। जाहिर है कि बाजार में बजरी की उपलब्धता में कोई कमी नहीं है। यह अवश्य है कि काला बाजारी में बजरी की दरें 10 हजार से 18 हजार रुपए प्रति डंपर तक पहुंच गई है। यह हालात तब हैं जब खान विभाग ने जिले के किशनगढ़, गोविन्दगढ़ (पीसांगन) तथा नसीराबाद के लीज धारियों के लाइसेंस निरस्त कर दिए हैं। न तो पीडब्ल्यूडी के अधिकारी न खान विभाग यह जानने की कोशिश कर रहा है कि सरकारी कार्यों में उपयोग हो रही बजरी की इतनी तादाद आ कहां से रही है।

पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने लगा रखा है क्रेशर डस्ट पर प्रतिबंध बड़ा सवाल : रोजाना 12 से 15 बजरी के डंपर कहां से आ रहे?

रेलवे स्टेशन के बाहर चल रहे निर्माण कार्य के लिए डाली गई बजरी।

क्या करंे निजी निर्माता

सरकारी कामों में महंगे दामों की अवैध बजरी का उपयोग ठेकेदार और इंजीनियर मिलकर इस तरह एडजस्ट कर देते हैं कि ठेकेदारों का घाटा काफी हद तक पूरा हो जाए। मगर बिल्डर अथवा छोटे गृह निर्माता इस नुकसान की कैसे भरपाई करें इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इतनी लंबी अवधि की अदालती रोक के बावजूद सरकार ने इस दिशा में कोई विकल्प उपाय नहीं ढूंढें है। यदि लंबे समय से यह समस्या चलती है तो रियल स्टेट के कारोबार के साथ पूरी अर्थ व्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।

बढ़ गए दाम | यह सही है कि क्रेशर डस्ट के दामों में पिछले अर्से के दौरान बे हताशा बढ़ोतरी हुई है इसके दाम पांच हजार रुपए प्रति डंपर से बढ़कर 12 हजार रुपए तक पहुंच गए। शहर में प्रतिदिन पचास से साठ डंपर क्रेशर डस्ट के आ रहे हैं।

ये जानना भी जरूरी

आशंकित है व्यापारी | अधिकारियों ने व्यापारियों को जयपुर की तर्ज पर क्रेशर डस्ट की सफाई का प्लांट लगाने का सुझाव दिया, लेकिन चुनाव तक रोक लग जाने की आशंका के चलते कोई व्यापारी लाखों का प्लांट लगाने को तैयार नहीं है।

क्रेशर डस्ट नहीं स्थाई विकल्प

जैसा की ऊपर कहा जा चुका है कि खुद सरकारी इंजीनियरों ने ही क्रेशर डस्ट के उपयोग पर पाबंदी लगा रखी है। दूसरी तरफ सरकार आम लोगों को बजरी के स्थान पर क्रेशर डस्ट के उपयोग की सलाह दे रही है। इंजीनियरों का कहना है कि अजमेर जिले में उस गुणवत्ता का क्रेशर डस्ट उपलब्ध नहीं है जो बजरी के विकल्प का रूप ले सके। इनके अनुसार माखुपुरा, पालरा, मसूदा व किशनगढ़ से निकलने वाला चुनाई पत्थर व फेल्सपार ग्रेनाइट के टुकड़ों को मिलाकर अजमेर में क्रेशर डस्ट तैयार की जा रही है। यह डस्ट बारीक व चिकनी होने के कारण चुनाई में उपयुक्त नहीं है। इंजीनियरों का कहना है कि आरसीसी की भर्ती में मोटी बजरी होनी चाहिए जबकि अजमेर की क्रेशर डस्ट पाउडर जैसी है।

केवल पत्थरों की हो रही पिसाई | जिले में किशनगढ़ में छह, पाल रा रीको में सात से आठ तथा श्रीनगर क्षेत्र में करीब दस क्रेशर डस्ट के प्लांट लगे हुए हैं। जहां केवल पत्थरों को दरदरा पीसकर सप्लाई किया जा रहा है।

नला बाजार में चल रहे सीसीरोड निर्माण कार्य के लिए मंगवाई गई बजरी।

मशीनों की लागत ही लाखों में | िशेषज्ञों का कहना है कि सही क्रेशर डस्ट के लिए जिस तरह का पत्थर वांछित है उस तरह का पत्थर जयपुर, कोटा, सीकर, झूंझुनंू क्षेत्रों में उपलब्ध है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि अजमेर में उपलब्ध पत्थरों से क्रेशर डस्ट तैयार करनी है तो इसके लिए विशेष क्रेशर प्लांट लगाना पड़ेगा।

इनका कहना है