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होली सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनेगी, आज जलेगी; कल मचेगी धुलंडी की धूम

होली सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनेगी, आज जलेगी, कल मचेगी धुलंडी की धूम

Bhaskar News | Last Modified - Mar 01, 2018, 01:01 AM IST

  • होली सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनेगी, आज जलेगी; कल मचेगी धुलंडी की धूम
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    कोटा. होली पर इस बार सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनाई जाएगी। योग कई राशि के जातकों के लिए खास रहेगा। पूर्णिमा पर आज होली जलेगी और कल धुलंडी मनाई जाएगी।इस महीने के सभी दिनों में विभिन्न राशियां अपना गृह परिवर्तन करती हैं। इस कारण ही 2 मार्च को इस बार होली में बेहद खास योग बन रहा है। मंदिरों में इस दिन भिखारियों को खीर-पूड़ी खिलाने से उन्नति के द्वार खुलेंगे।

    ज्योतिषाचार्य अमित जैन के अनुसार, इस बार होली के हुड़दंग को छोड़कर कुछ समय भगवान शिव की पूजा में अर्पित करें। भोलेनाथ को भांग, गुड़, बेलपत्र और दूध चढ़ाएं। 2 मार्च को सुबह 7 बजे से 9.30 बजे के बीच जलाभिषेक करें और इसके बाद तत्काल अबीर, रोली के साथ पकवान भी चढ़ाएं ताकि अशांत ग्रह शांत हो जाएं और महादेव की कृपा से रुका हुआ कार्य पूर्ण हो।


    7.41 का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त
    जैन के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन संध्याकाल में भद्रा दोष रहित समय में होलिका दहन किया जाता है। होली जलाने से पूर्व उसकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। अग्नि एवं भगवान विष्णु के निमित्त आहुतियां दी जाती हैं। एक मार्च की सुबह 8.05 बजे तक चतुर्दशी तिथि रहेगी। इसके बाद शाम 7.25 बजे तक भद्रा रहेगा। उसके बाद होली का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 7.41 बजे का होगा। इसलिए उस दिन भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन होगा। दो तारीख की सुबह होली खेली जाएगी। दो मार्च पूर्णिमा तिथि के बीच वृहस्पतिवार को होलिका दहन हो रहा है। जिससे सिद्धि योग बन रहा है। इसका प्रभाव देश, राज्य एवं समस्त जनों के लिए बहुत ही शुभ व कल्याणकारी होगा। आपस में मेलजोल और सामाजिक सौहार्द कायम होंगे।


    राख स्नान से मिलेगी रोगों से मुक्ति
    होली के दिन गेहूं की बाली भी होलिका में भूनें, इसके बाद भुनी हुई बाली सबको वितरित करें। इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि गेहूं की फसल का प्रथम भोग भगवान को अर्पित करें। पंडित रितेश तिवारी ने बताया कि होलिका की राख ठंडी होने पर उसे ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: का जाप करते हुए शरीर के अंगों पर लगाएं इससे चर्म रोग दूर हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि मेष, वृष, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, धनु, कुंभ राशि वालों के लिए यह होली लाभदायक होगी।

    रियासतकालीन होली : गुलाल की पोटली व गोटा फेंक कर होली खेलते थे महाराव

    रियासतकाल में कोटा की होली की अपनी एक पहचान रही है। इतिहासकार डॉ. जगत नारायण ने अपनी पुस्तक महाराव उम्मेदसिंह और उनका समय पुस्तक में इसका जिक्र किया है। डॉ. नारायण के अनुसार कि मिति चैत्र बुद तीज को नाबड़ा की होली होती थी। यह होली कोटा में प्रसिद्ध थी। महाराव उम्मेदसिंह के समय होली में शरीक होने के लिए कोटा की जनता चंबल नदी के दोनों किनारों पर उमड़ती थी।


    वहीं दूसरी ओर कोटा में हाथियों की होली कोटा की जनता के मनोरंजन का सबसे बड़ा कार्यक्रम होता था। इस होली के नाम से लोग महाराव उम्मेदसिंह की जिंदादिली, जन प्रेम एवं लोकप्रियता को आज भी याद करते हैं। यह होली मिति चेत बुद चतुर्थी को होती थी। इस होली में पहले महाराव गढ़ में आकर पतंगी रंग की नई पोशाक व लपेटा धारण कर 12 बजे दिन में जनानी ढयोढ़ी पहुंचते थे और वहां चंद्रमहल में महाराणी व राणीजी के साथ होली खेलते थे। इसी बीच जागीरदार, सरदार आदि को हाथियों पर बैठने का हुक्म हो जाता था, इसके बाद महाराव अपने खास हाथी पर बैठते थे। यह भी जिक्र किया है कि उस समय महाराव बड़े छोटे सभी व्यक्तियों से समानता से होली खेलते थे। होली उत्सव उनकी मनो विनोदी प्रकृति के कारण उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण था। सरदारों आदि के हाथी दरबार के हाथी के सामने आ जाते तब दरबार सभी पर गुलाल की पोटली व गुलाल गोटा फेंक कर होली खेलते थे। दरबार के हाथी के साथ फव्वारा रहता था। जिसको चलाने के लिए उस्ताद, कारीगर व मिस्त्री लोग तथा फव्वारा के लिए पानी भरने के लिए 40-50 भिश्ती मौजूद रहते थे। जो पानी भरते रहते थे। फव्वारा के पानी में रंग भी मिलाते थे। फव्वारे से दरबार सभी पर रंग डालते थे। खूब होली खेलने के बाद पूरी सवारी के जाब्ते के साथ, जिसमें सवारी में चलने वाले परंपरागत सभी अंग रहते थे। सवारी गढ़ से रवाना होती थी। सवारी गढ़ से पाटनपोल, घंटाघर, रामपुरा होती हुई लाडपुरा तक जाती थी। इस दौरान दरबार जनता पर गुलाल बरसाते जाते थे। शहरवासी आपस में तथा सवारी पर चलने वालों पर गुलाल एवं रंग डालते थे। डाकखाना के पास से दरबार हाथी पर उतरकर कोठी चले जाते थे और सवारी बृजविलास बाग चली जाती थी। हाथियों की होली के अवसर पर शहर का अनूठा नजारा होता था। शाम को बृजविलास में दावत होती थी। भोज के बाद महाराव आने वाले को बीड़ा और माला बख्शते थे। होली नहाण पर सुबह और शाम को दरी खाना होता था। सुबह के दरीखाने में महाराव पतंगी रंग की नई पोशाक पहनकर राजमहल में छोटी बिछावत पर गादी पर बैठते थे। इसके बाद दरीखाने में होली का दरी खाना होता था। दरबार उपस्थित लोगों पर अबीर-गुलाल गोटा फेंकते थे। उपस्थित लोग आपस में होली खेलते हैं। शाम का दरी खाना हथिया पोल दरवाजे के बाहर बड़े चबूतरे पर लगता था। यहां अखाड़े में जेठियों की कुश्ती, जिमनास्टिक का खेल और मशक का बाजा बजता रहता था। इसके अलावा अन्य आयोजन होते थे।


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    आस्ट्रेलिया की विक्टोरिया गैलरी में है कोटा की 1844 की दुर्लभ होली पेंटिंग

    कोटा की होली की अपने समय में खास पहचान थी। पूर्व महाराव रामसिंह द्वितीय के समय की होली की दुर्लभ पेंटिंग आज भी आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया आर्ट गैलरी में सुरक्षित है। अभिमन्यु सिंह बंबूलिया बताते हैं कि उनके समय खेली जानी वाली हाथियों की होली की पेंटिंग उनके भतीजे के पुत्र बांसवाड़ा निवासी परीक्षित सिंह ने आस्ट्रेलिया से मोबाइल पर भिजवाई है। उन्होंने बताया कि पूर्व महाराव रामसिंह की 1844 की इस पेंटिंग में हाथियों पर होली खेलने के रामपुरा का दृश्य बताया है। पूर्व महाराव हाथियों पर सवार होकर पिचकारी चलाते हुए होली खेल रहे हैं, वहीं महिलाएं छतों पर से गुलाल उड़ेल रही हैं। वहीं इनके साथ पूर्व महाराव के साथ प्रमुख पलायथा, कुन्हाड़ी, कोयला के ठिकानेदार सहित मयाराम धाबाई, लाला देवताजी छोटा का जिक्र किया गया है। इसमें मशकची पानी रहे हैं तो पंप से पिचकारी में रंग भरा जा रहा है। साथ में सैनिकों का लवाजमा भी है।

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