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20 साल की नौकरी में पूरी जवानी खपाई, अब तक 5 हजार रुपए भी नहीं पहुंची सैलेरी

मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पतालों में एजेंसियों के माध्यम से कार्यरत 1 हजार कर्मियों की व्यथा

Danik Bhaskar | Jan 26, 2018, 06:31 AM IST

कोटा. कोटा मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पतालों में हो रहे “सरकारी शोषण’ की यह महज बानगी भर है। ऐसे दर्जनों लोग हैं, जिन्होंने यहां जवानी खपा दी और अब भी 3 से 4 हजार रुपए मासिक पगार मिल रही है। एमबीएस, न्यू मेडिकल कॉलेज और जेकेलोन हॉस्पिटल में संविदा पर अलग-अलग प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से 1 हजार से ज्यादा कार्मिक काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि ये कोई कम पढ़े लिखे हुए हैं, बल्कि ज्यादातर उच्च शिक्षा प्राप्त है। कोई स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त है तो किसी ने टेक्नीकल डिप्लोमा किए हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद दिहाड़ी मजदूर जैसी सैलेरी पर ये काम करने को मजबूर हैं। इन दिनों ये सभी कर्मचारी आंदोलन की राह पर हैं।

- इनका कहना है कि हम प्लेसमेंट एजेंसियों से मुक्ति चाहते हैं। पूरे राज्य में कई अस्पतालों में प्लेसमेंट एजेंसियों की व्यवस्था समाप्त करके संबंधित अस्पतालों की आरएमआरएस से भुगतान करना शुरू कर दिया गया है।

- इनकी मांग है कि कोटा में भी हमें सीधे आरएमआरएस से भुगतान किया जाए, ताकि ठेकेदारों की “कटौती’ से हम बच सकें।

अब आंदोलन की राह पर संविदा कर्मी

केस-1 : कोटड़ी के रहने वाले अर्जुन कुमार (45) करीब 20 साल से जेकेलोन अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में बतौर वार्डब्वॉय कार्यरत हैं। संविदा पर उन्होंने 1997 में यह नौकरी ज्वाॅइन की और पहली पगार 700 रुपए मिली थी। उम्मीद थी कि सरकारी सिस्टम में काम करेंगे तो कुछ समय में सैलेरी भी ठीकठाक हो जाएगी और परिवार का गुजर-बसर अच्छे से कर पाएंगे। लेकिन आज भी उन्हें सिर्फ 4700 रुपए मिलते हैं। परिवार में 8 लोग हैं।

केस-2 : हेमराज मीणा भी इसी अस्पताल में बतौर वार्डब्वॉय संविदा पर काम करते हैं, लेकिन उनसे काम इलेक्ट्रिशियन का लिया जाता है। करीब 14 साल से अस्पताल की बिजली व्यवस्था की कमान उनके हाथ में है। रात-दिन कभी भी कुछ हो, तत्काल उन्हें कॉल किया जाता है। उन्होंने वर्ष 1900 रुपए मासिक पगार में ज्वाॅइन किया था और आज इतने साल बाद भी 4700 रुपए ही मिल रहे हैं। परिवार में पत्नी, बच्चों सहित 5 सदस्य हैं।

केस-3 : पाटनपोल के रहने वाले अमित तिवारी डीडीसी काउंटर पर कंप्यूटर ऑपरेटर हैं। उन्हें यहां नौकरी करते हुए 8 साल हो गए। पहली पगार 3100 रुपए थी, अब 4700 रुपए मिल रहे हैं। परिवार में बेटी और पत्नी है। कैसे गुजारा हो रहा है? इसके जवाब में वे कहते हैं कि बस पूछिए मत... गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह चला रहा हूं।

इसमें भी खुद का लाभ देख रही प्लेसमेंट एजेंसियां
कर्मचारियों ने कहा कि हमें पहले से इतनी कम सैलेरी मिल रही है और उसमें भी हर माह ठेकेदार मनमानी कटौती करता है। किसी कर्मचारी की सैलेरी से 500 तो किसी से 1 हजार रुपए काट लिए जाते हैं। मजबूर हैं, ऐसे में चाहकर भी कुछ नहीं कह सकते, क्योंकि आवाज उठाने पर ठेकेदार अगले ही दिन उस कर्मचारी को हटा देते हैं। हर साल ठेके बदल जाते हैं तो नए ठेकेदार से हाथा-जोड़ी और करनी पड़ती है।

एजेंसी के माध्यम से इन पदों पर काम कर रहे हैं
स्वीपर, सिक्योरिटी गार्ड, कंप्यूटर ऑपरेटर, हेल्पर, वार्ड ब्वॉय, लैब टेक्नीशियन, इलेक्ट्रिशियन, लैब अटेंडेंट, लॉन्ड्री ब्वॉय, डाटा एंट्री ऑपरेटर, पंप हाउस पर वाटर मैन, प्लंबर, ट्रॉलीमैन, रेडियोग्राफर, फार्मासिस्ट, नर्सिंग स्टाफ और यहां तक कि फिजियोथैरेपिस्ट भी काम कर रहे हैं। तीनों जगह मिलाकर 1 हजार से ज्यादा कर्मचारी इन पदों पर लगे हुए हैं। हाल ही में इन्होंने एक यूनियन भी बनाई है।

यदि हम सारे संविदा कर्मी एक दिन भी काम बंद कर दें तो अस्पतालों को कोई नहीं चला पाएगा। लेकिन, हम ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि हमें मरीजों की सेवा करनी है। आरएमआरएस से भुगतान की मांग को लेकर हम दो बार प्रिंसिपल से मिल चुके हैं, कलेक्टर को भी ज्ञापन दिया है। अब उम्मीद है कि हमारी समस्या का कोई समाधान होगा।
- भरत व्यास, अध्यक्ष, ठेका श्रमिक संघर्ष समिति