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रेलवे के पास कोहरे से निपटने का तरीका नहीं, डेटोनेटर से पता चलता है सिग्नल

कोहरे में ड्राइवरों को नहीं दिखता सिग्नल, इस वजह से लेट चलती हैं ट्रेन

Dainik Bhaskar

Jan 08, 2018, 07:45 AM IST
indian Railways do not have a way to deal with fog

कोटा. कोहरे में ट्रेनों को लेट होने से बचाने के लिए रेलवे के पास अभी तक कोई कारगर प्रणाली नहीं है। इस दौरान सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि ट्रेन ड्राइवरों को सिग्नल ही नहीं दिखता। इसके चलते हादसे से बचने के लिए ट्रेनें धीमी गति से चलाई जाती हैं। सिग्नल का पता लगाने के लिए अभी भी पटाखों (डेटोनेटर) का उपयोग किया जाता है, जो कई दशक पुराना तरीका है। कोटा रेल मंडल में सर्दी के सीजन में व आपातकाल के दौरान हर साल लगभग 3 हजार से अधिक डेटोनेटर का उपयोग होता है। एक डेटोनेटर की कीमत लगभग 50 रुपए है।

ट्रेन सिग्नल के नजदीक आते ही धमाका होता है डेटोनेटर से

कोहरा प्रभावित क्षेत्र में पटाखों को होम सिग्नल के पास ट्रैक पर लगाया जाता है। पटाखों पर क्लिप लगा होता है उस क्लिप से ही ट्रैक पर पटाखा टिकता है। जैसे ही ट्रेन का इंजन उस पटाखे से गुजरता है जोरदार धमाका होता है। इससे ट्रेन ड्राइवर समझ जाता है कि सिग्नल पास आ चुका है। वो ट्रेन को आगे बढ़ाता जाता है।

पेट्रोलमैन को दिए जीपीएस
कोहरे के कारण रेल पटरी पर दरार आ जाती है। इस कारण से रेल प्रशासन सर्दी शुरू होते ही गैंगमैन को पेट्रोलिंग के लिए लगाता है। इस बार पेट्रोलमैन के साथ होम गार्ड भी लगाए गए हैं। उन्हें जीपीएस दिए गए हैं। प्रत्येक रेलकर्मी को 2 किमी की गश्त करनी होती है। लॉग बुक में लिखना होता है कि रेल पटरी पर कितने किमी पर दरार दिखी या ट्रैक पूरी तरह सही है।

कोटा मंडल में कोहरे का ज्यादा असर
कोटा रेल मंडल में कोहरे का सबसे ज्यादा असर सवाईमाधोपुर से मथुरा, कोटा-बीना खंड व कोटा-चित्तौड़गढ़ सेक्शन में नवंबर से जनवरी के अंत तक होता है। कोहरे के कारण ट्रेनों की स्पीड कम हो जाती है क्योंकि ड्राइवर व असिस्टेंट ड्राइवरों को सिग्नल नहीं दिखते। कई बार हालत ये भी हो जाती है कि ट्रेनों को पायलट करना पड़ता है। प्वाइंट्समैन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर आगे बढ़ाता है। सिग्नल का पता लगाने के लिए सिग्नल से कुछ मीटर पहले ट्रैक की गिट्टी पर चूना भी डाला जाता है। दिल्ली-मुंबई रेलमार्ग पर डबल डिस्टेन सिग्नल सिस्टम लगा है। इस सेक्शन में इमरजेंसी में ही डेटोनेटर का उपयोग होता है।

लेटलतीफी में बदनाम हैं ये ट्रेन

- पटना-कोटा ट्रेन अब तक सर्वाधिक लेट 31 घंटे
- कटरा-मुंबई 7 घंटे
- स्वर्ण मंदिर मेल 4.30 घंटे
- देहरादून एक्सप्रेस 5 घंटे
- मथुरा-रतलाम 4 घंटे
- स्वराज एक्सप्रेस 9 घंटे

- कोहरे के कारण मेरठ-मंदसौर लिंक एक्सप्रेस को जनवरी में तीन बार आधे रास्ते चित्तौड़गढ़ तक चलाया गया है। इस ट्रेन को चित्तौड़गढ़ तक चलाए जाने से कोटा से मंदसौर जाने वाले यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

ब्रांच लाइन पर ही डेटोनेटर का इस्तेमाल
बीना व चित्तौड़गढ़ ब्रांच लाइन में डेटोनेटर का उपयोग सबसे अधिक होता है। मेन लाइन पर डबल डिस्टेन सिगनल सिस्टम लगा है। इस सेक्शन में जरूरत नहीं होती। -डॉ. आरएन मीणा, सीनियर डीएसओ

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