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जेल के बैरकों में काम नहीं कर रहे हैं 4जी जैमर, खुलेआम चल रहे मोबाइल

लापरवाही: 32 सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, एक साल से नहीं कर रहे काम

Bhaskar News| Last Modified - Mar 15, 2018, 04:53 AM IST

mobile use openly in Kota Central Jail
जेल के बैरकों में काम नहीं कर रहे हैं 4जी जैमर, खुलेआम चल रहे मोबाइल

कोटा. कोटा सेंट्रल जेल में प्रतिबंध के बावजूद खुलेआम मोबाइल चल रहे हैं। जेल में लगे 4जी जैमर सिर्फ दिखावे के लिए हैं क्योंकि वर्तमान में यहां लगे जैमर मोबाइल सिग्नल को जाम नहीं कर पा रहे हैं। जेल में अभी 1500 से ज्यादा कैदी-बंदी हैं, जो 22 बैरक में बंद हैं। जेल के निरीक्षण तो सिर्फ रिकॉर्ड मेंटेन करने और खानापूर्ति के लिए किए जा रहे हैं क्योंकि जेल प्रशासन को भी पता है कि यहां मोबाइल चल रहे हैं। अधिकृत तौर पर जेल अधिकारी यह दावा करने से हिचक रहे हैं कि इन 22 बैरक में जैमर अपनी पूरी फ्रिक्वेंसी से काम कर रहे हैं। मंगलवार को निरीक्षण के दौरान जेल में मिले 4 मोबाइल के बाद भास्कर रिपोर्टर ने बुधवार को 2 घंटे सेंट्रल जेल परिसर में बिताए।

 

भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि बंदियों, कैदियों और जेलकर्मियों की मॉनिटरिंग के लिए लगे 32 सीसीटीवी कैमरे बंद पड़े हैं। जेल की छत पर चार जैमर लग रहे हैं, लेकिन आज तक उन्होंने अपनी पूरी क्षमता से कभी काम ही नहीं किया। अधिकारी भी इसे स्वीकारते हैं कि जेल की इन 22 बैरकों और दूसरे परिसरों में मोबाइल कभी काम करता है कभी नहीं। जैमर कब काम करेगा कब नहीं? इसका  किसी को कुछ पता नहीं होता। पढ़िए, कोटा सेंट्रल जेल में चल रही ऐसी खामियों पर भास्कर की रिपोर्ट-

 


जेल परिसर में हर कोई नजर आया मोबाइल पर बात करते हुए
जेल परिसर में हर कोई मोबाइल पर बात करते नजर आया। वहां आने वाले कैदियों के परिजन, वकील, पुलिसकर्मी और क्वार्टर में रहने वाले जेल कर्मचारी आराम से मोबाइल पर बात करते हुए देखे गए। जब रिपोर्टर ने वहां तैनात आरएसी के कर्मचारियों से पूछा कि मोबाइल आसानी से चलते हैं क्या? तो उन्होंने कहा कि यहां तो कभी मोबाइल बंद नहीं हुए। 

 

32 सीसीटीवी : डीवीआर के बिना नहीं हो रही सालभर से रिकॉर्डिंग
जेल में हाई एचडी क्वालिटी के 32 सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लेकिन वो 1 साल से काम नहीं कर रहे। अप्रैल 2017 में एसीबी ने जेल पर छापा मारकर डिप्टी जेलर बत्तीलाल मीणा को दलाल से पैसे लेते रंगेहाथों गिरफ्तार किया था। एसीबी ने इन्वेस्टिगेशन के लिए बतौर सबूत डीवीआर जब्त किया। इसके बाद आज तक नया डीवीआर नहीं लगा। इस वजह से कैमरे रिकॉर्डिंग नहीं कर पर रहे। जेल प्रशासन ने मुख्यालय को पत्र लिखकर डीवीआर लगाने के लिए बजट मांगा, लेकिन वहां से बजट नहीं मिल पाया। 

 

 

04 मोबाइल जैमर : छत पर लगने के बावजूद रेंज से बाहर हंै बैरक
जेल में बंद कैदी और बंदी जैमर को नुकसान न पहुंचाएं इसलिए मोबाइल जाम करने वाले चार जैमर जेल की छत पर लगाए गए हैं। इनकी फ्रिक्वेंसी जेल के हर हिस्से में है, लेकिन वो अपनी पूरी ताकत से काम नहीं कर रही। क्योंकि जैमर की रेंज ट्राईएंगुलर शेप में काम करती है। वहीं, दूसरे बैरकों में भी जैमर की फ्रिक्वेंसी लो है। जैमर चंडीगढ़ की कंपनी ने लगाए हैं, इनका मेंटीनेंस की जिम्मेदारी भी कंपनी के पास है। जेल प्रशासन ने इस कंपनी और उच्च अधिकारियों को कई बार चिट्ठियां लिख दी, लेकिन इसमें आज तक सुधार नहीं हो पाया। 

 

40% स्मैकची हैं जेल में : जेल की क्षमता 1036 बंदी-कैदियों की है। जिसमें पहले ही क्षमता से अधिक  1500 कैदी, बंदी रह रहे हैं। वर्तमान में यहां करीब 600 स्मैकची बंद हैं। जेल अधीक्षक सुधीर पूनिया ने कहा कि वो सबसे ज्यादा परेशान ही स्मैकचियों से हैं। प्रदेश की दूसरी जेलों में इसने स्मैकची नहीं होते। स्मैकची नए-नए पैंतरे अपनाकर जेल में मोबाइल व ड्रग्स ले जाते हैं, जिन्हें समय-समय पर जांच करके पकड़ा जाता है।

 

#यह स्कैन इसलिए जरूरी

 

1. सात साल में मिले 50 मोबाइल, सिम और चार्जर : वर्ष 2010 से 2017 के बीच जेल में 50 मोबाइल, सिम और चार्जर बरामद हो चुके हैं। रुद्राक्ष हत्याकांड के आरोप अनूप पाड़िया के बैरक से भी चार्जर और बैटरी मिली। इससेे पहले ईश्वर सिंह, कालू, युनुस भाई, जयराम, भैरूलाल दांगी, कालू उर्फ युनुस, रशीद, सलमान, अनिल, रमेशचंद, अक्षय पाठक, दीपक पाठक, आमीन रंगरेज आदि से मोबाइल व  सिम जब्त की।

 

 

2. साबित हो चुकी जेल कर्मचारियों की मिलीभगत : विशेष मुलाकातों की आड़ में जेल में ऐसी कई प्रतिबंधित वस्तुएं गईं, जिनका जेल मैन्युअल में जिक्र नहीं मिलता। जेल प्रहरी की भी मिलीभगत रही। कई बार तो जेल प्रहरी प्रतिबंधित सामान ले जाते पकड़े गए। प्रहरी राजेन्द्र सिंह से मोबाइल मिलने पर निलंबित कर नोटिस दिया गया था। प्रहरी जगदीश प्रसाद से मोबाइल मिलने पर 17 सीसी का नोटिस दिया गया था। 

 

 

भास्कर नॉलेज: कमजोर कानून से बदमाशों की मौज
आईपीसी और आईटी एक्ट में ऐसी कोई धारा नहीं है, जिसमें कैदी के पास मोबाइल मिलने पर उसके खिलाफ मामला दर्ज करा सके। 64 साल पुराने कारागार अधिनियम के अनुसार जेलों में मोबाइल, लैपटॉप जैसे गैजेट्स प्रतिबंधित नहीं हैं। मोबाइल मिला तो 15 से 30 दिनों तक बंदी की परिजनों से मुलाकात बंद की जाती है। वहीं, चरस मिलने पर सिर्फ चेतावनी दी जाती है। वहीं, गुजरात में मोबाइल प्रतिबंधित सामग्री है, मिलने पर लोकल एक्ट में कार्रवाई की जाती है। हरियाणा में प्रिजन एक्ट की धारा 42 के तहत कार्रवाई की जाती है।

 

 

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