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वकालत छोड़ उत्तराखंड के गांवों में बच्चों काे पढ़ा रहे कोटा के श्रेयांस

पढ़ाई पूरी करने के बाद कोटा के श्रेयांस रानीवाला को अच्छे-खासे पैकेज पर लॉ फर्म में जॉब मिल गई।

Bhaskar News | Last Modified - Jan 29, 2018, 07:36 AM IST

वकालत छोड़ उत्तराखंड के गांवों में बच्चों काे पढ़ा रहे कोटा के श्रेयांस

कोटा.पढ़ाई पूरी करने के बाद कोटा के श्रेयांस रानीवाला को अच्छे-खासे पैकेज पर लॉ फर्म में जॉब मिल गई। श्रेयांस का पूरा परिवार समाजसेवा से जुड़ा है लिहाजा उनके मन में भी समाज के लिए कुछ करने का जज्बा था। इसके चलते उन्होंने नौकरी छोड़ दी। पिछले 6 महीने से वे उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों की खाक छान रहे हैं। उन्होंने कुमाऊं के 6 गांवों में शिक्षा का उजियारा फैलाने का बीड़ा उठाया है। ये इलाका इतना दुर्गम है कि यहां सरकारी टीचर भी जाने से घबराते हैं।

एक से दूसरे गांव जाने में 4 घंटे लगते हैं। बच्चे भी स्कूल नहीं जाते थे। उनके प्रयासों से इन गांवों के 120 से अधिक बच्चे अब स्कूल जाने लगे हैं। इन स्कूलों में लाइब्रेरी भी बना दी है, जिससे बच्चों को फ्री में किताबें भी मिलती हैं।
कोटा के रहने वाले श्रेयांस रानीवाला अहमदाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें किसी ने कहा कि पहाड़ों में रहने वाले बच्चे अाज भी शिक्षा से वंचित हैं। उनके गांवों में स्कूल तो हैं, लेकिन टीचर नहीं है। रास्ते इतने खतरनाक हैं कि टीचर एक बार जाने के बाद दुबारा नहीं जाता है। जिन स्कूलों में टीचर हैं, वे भी शिक्षा पर ध्यान नहीं देते। बच्चे भी स्कूल जाने से कतराते हैं। स्कूलों की हालत भी ठीक नहीं है। इसके बाद श्रेयांस ने वहां जाने का मन बना लिया। वे पिछले छह महीने से पहाड़ों में हैं और 6 गांवों में शिक्षा के लिए काम कर रहे हैं। अब वह शिक्षा के लिए काम करने वाली कैवल्य फाउंडेशन से जुड़ गए हैं। उन्हें मानदेय के नाम पर महीने में लगभग 7 हजार रुपए मिलते हैं।

रास्ते इतने दुर्गम कि एक से दूसरे गांव तक पहुंचने में लग जाते हैं 4 घंटे

श्रेयांस ने बताया कि वे जब पहाड़ों में गए तो हालत ये थी कि दुर्गम रास्तों की वजह से बच्चे स्कूल ही नहीं आते थे। जिन टीचरों की पोस्टिंग हुई उन्होंने यहां ज्वाइन करने से ही मना कर दिया। उन्होंने कुमाऊं के 6 गांवों करनी, तला कुल्ला कर्मी, धारम, दोबार, शरण व बगड़ के स्कूलों में पढ़ाने का जिम्मा उठाया। इन गांवों का रास्ता इतना दुर्गम है कि एक से दूसरे गांव जाने में बाइक से 2 घंटे लगते हैं। इसके अलावा कम से कम 2000 मीटर की खड़ी चढ़ाई पैदल पार करनी पड़ती है। एक गांव में एक सप्ताह बिताते हैं। गांव में बच्चों, अभिभावक और टीचर को शिक्षा के लिए समझाते हैं। अब छह गांवों में 120 से ज्यादा बच्चे पढ़ने आने लगे हैं। चार स्कूलों में लाइब्रेरी बना दी है।

खाना भी गांव वालों के साथ : श्रेयांस ने बताया कि संस्था की ओर से उन्हें 7 हजार रुपए महीना दिया जाता है, लेकिन वे पैसे के लिए यह काम नहीं कर रहे हैं। यह उनका पैशन है। गांव वाले उन्हें गांधी फैलो के नाम से पुकारते हैं और वे उनके साथ ही खाना खाते हैं।

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Web Title: vkalt chhode uttraakhnd ke gaaanvon mein bachcho kae pढ़aa rahe kotaa ke shreyaans
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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