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थैलेसीमिक किशोर को एचआईवी, डॉक्टर बोले-ब्लड ट्रांसफ्यूजन से हुआ संक्रमण

ढाई माह पहले तबीयत बिगड़ी, दवाएं बेअसर हुई तो डॉक्टरों को जांच कराने पर पता चली बीमारी

Dainik Bhaskar

Jan 21, 2018, 07:21 AM IST
Thalassemic teenage HIV sufferers in kota

कोटा. जिंदगी देने वाले खून ने एक किशोर को जीते जी ‘मौत’ दे डाली। अब पूरा परिवार सदमे में है। छावनी के रहने वाले साढ़े 17 साल के किशोर को थैलेसीमिया है। कई साल से उसका ब्लड ट्रांसफ्यूजन करवाया जाता है। करीब ढाई माह पहले अचानक उसकी तबीयत खराब हुई और दवाओं से आराम नहीं मिला तो हफ्तेभर पहले उसे जेकेलोन अस्पताल में भर्ती कराया। जांच में उसे टीबी की पुष्टि हुई। क्लीनिकल प्रोटोकॉल के हिसाब से ऐसे बच्चों में टीबी डायग्नोस होते ही एचआईवी टेस्ट भी कराना होता है। सेंट्रल लैब से शनिवार को दी गई रिपोर्ट में उसे एचआईवी पॉजिटिव पाया गया।


किशोर के पिता ने कहा कि बेटा सरकारी स्कूल में 12वीं का स्टूडेंट है। 15-20 दिन के अंतराल में उसे ब्लड चढ़वाता हूं। पहले सरकारी और अब लंबे समय से एक प्राइवेट ब्लड बैंक से ब्लड चढ़वा रहा हूं। समझ यह नहीं आ रहा कि कौन से रक्त से उसे यह संक्रमण हुआ? बालक की स्थिति बेहद गंभीर है, उसे एचआईवी के एआरटी ट्रीटमेंट के लिए जेकेलोन से नए अस्पताल में रैफर किया गया है। कोटा में किसी थैलेसीमिक बच्चे को एचआईवी संक्रमण का यह पहला ही केस रिपोर्ट हुआ है। बच्चे के परिवार वालों का कहना है कि वे उच्च स्तरीय जांच की मांग को लेकर अधिकारियों से मिलेंगे और कानूनी कार्रवाई भी करेंगे। हमारा किसी पर व्यक्तिगत आरोप नहीं है, लेकिन इसकी जांच होनी चाहिए।

कोटा के ब्लड बैंकों में हो रहा फोर्थ जेनरेशन किट का इस्तेमाल
इस केस के सामने आने के बाद भास्कर ने ब्लड बैंकों की पड़ताल की। हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि हमारे यहां ब्लड बैंकों में डोनर जो खून देते हैं, उसकी जांच पुराने मेथड से हो रही है। यानी किसी व्यक्ति को आज एचआईवी संक्रमण हुआ और वह 3 हफ्ते यानी 18 से 21 दिन के भीतर किसी भी ब्लड बैंक में जाकर ब्लड डोनेट कर आया तो वहां होने वाली एचआईवी जांच में उसे पॉजिटिव नहीं आएगा। ऐसे में यह ब्लड दूसरे मरीज को दे दिया जाएगा। अब जब संक्रमित खून किसी स्वस्थ मरीज को भी दिया जाएगा तो उसे संक्रमण होना स्वाभाविक है। आसान तरीके से समझिए ब्लड बैंकों में एचआईवी डिटेक्शन को लेकर यूज किया जा रहा मेथड-

भास्कर एक्सपर्ट : गारंटी किसी भी टेस्ट की नहीं, नेट टेस्टिंग से खतरा कम : डॉ. चौधरी
भास्कर ने इसे लेकर देश के जाने-माने हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. वीपी चौधरी से खास बात की। डॉ. चौधरी एम्स के हीमेटोलॉजी विभाग के एचओडी पद से रिटायर हैं और थैलेसीमिया को लेकर करीब 40 साल का तजुर्बा रखते हैं। उन्होंने बताया कि 100 फीसदी गारंटी किसी भी टेस्टिंग मेथड में नहीं हो सकती। हां, नेट टेस्टिंग से खतरे को कम जरूर किया जा सकता है। यह पूरी तरह डीएनए जैसा मेथड है। लेकिन इसका खर्च ज्यादा है। थैलेसीमिक बच्चों में एचआईवी काफी कॉमन है। जैसे-जैसे ट्रांसफ्यूजन रेट बढ़ती जाती है, वैसे ही खतरा भी बढ़ता जाता है। भारत में ऐसे मामले रिपोर्ट ही काफी कम हो पाते हैं।

550 थैलेसीमिक बच्चे रजिस्टर्ड, एचआईवी का पहला केस : एचओडी
कोटा मेडिकल कॉलेज के ब्लड ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन के एचओडी, एमबीएस ब्लड बैंक के इंचार्ज व जेकेलोन अस्पताल के अधीक्षक डॉ. एचएल मीणा ने बताया कि हमारे यहां 550 थैलेसीमिक बच्चे रजिस्टर्ड हैं। मेरे ध्यान में यह पहला केस सामने आया है, जिसे एचआईवी संक्रमण हुआ है। इस केस में कहां से ब्लड दिया जा रहा था या कहां से नहीं? इसे लेकर मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि यह संक्रमण कहीं से भी हो सकता है। मरीज की आज की स्थिति से तो लगता है कि उसे संक्रमण काफी पुराना रहा होगा। मैं यह भी दावा नहीं करता कि हमारे यहां से दिए गए ब्लड से ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि हमारे यहां भी फोर्थ जेनरेशन किट से ही टेस्ट हो रहे हैं, जिसमें संक्रमण का पता 3 सप्ताह तक नहीं लगता। लेकिन, इतना जरूर दावा करूंगा कि जिस भी मेथड से टेस्ट होते हैं, वे पूरी सावधानी से होते हैं।

बड़े अस्पतालों में ही होती है नेट टेस्टिंग

1. ब्लड बैंकों में एलाइजा मेथड से एचआईवी टेस्ट होते हैं। कुछ समय पहले तक थर्ड जेनरेशन किट से यह काम होता है, अब फोर्थ जेनरेशन किट से जांच हो रही है।

2. किसी को एचआईवी संक्रमण है तो थर्ड जेनरेशन किट 6 सप्ताह तक डिटेक्ट कर पाता था, अब फोर्थ जेनरेशन किट 3 सप्ताह तक के संक्रमण को डिटेक्ट कर पाते हैं।

3. इसका सबसे कारगर तरीका नेट टेस्टिंग (न्यूक्लिक एसिड टेस्ट) है, जो काफी महंगा है। नेट टेस्टिंग 5 दिन पुराने संक्रमण को भी पकड़ सकता है। भारत में कुछ बड़े और कॉर्पोरेट सेक्टर के हॉस्पिटलों में ही ये होती है।

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