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इस बार सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनेगी होली, आज शाम 7.41 बजे होलिका दहन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त

होली पर इस बार सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनाई जाएगी। योग कई राशि के जातकों के लिए खास रहेगा। पूर्णिमा पर आज होली...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 04:05 AM IST
होली पर इस बार सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनाई जाएगी। योग कई राशि के जातकों के लिए खास रहेगा। पूर्णिमा पर आज होली जलेगी और कल धुलंडी मनाई जाएगी।

इस माह में विभिन्न राशियां अपना गृह परिवर्तन करती हैं। इस कारण ही इस बार होली में बेहद खास योग बन रहा है। मंदिरों में इस दिन भिखारियों को खीर-पूड़ी खिलाने से उन्नति के द्वार खुलेंगे। ज्योतिषाचार्य अमित जैन के अनुसार इस बार होली पर कुछ समय भगवान शिव की पूजा में अर्पित करें। भोलेनाथ को भांग, गुड़, बेलपत्र और दूध चढ़ाएं। 2 मार्च को सुबह 7 बजे से 9.30 बजे के बीच जलाभिषेक करें और इसके बाद अबीर, रोली के साथ पकवान भी चढ़ाएं ताकि अशांत ग्रह शांत हो जाएं और महादेव की कृपा से रुका हुआ कार्य पूर्ण हो।

शाम 7.25 तक रहेगा भद्रा काल

जैन के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन संध्याकाल में भद्रा दोष रहित समय में होलिका दहन किया जाता है। एक मार्च की सुबह 8.05 बजे तक चतुर्दशी तिथि रहेगी। इसके बाद शाम 7.25 बजे तक भद्रा रहेगा। उसके बाद दहन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 7.41 बजे का होगा। दो मार्च की सुबह होली खेली जाएगी। पूर्णिमा तिथि के बीच गुरुवार को होलिका दहन हो रहा है। जिससे सिद्धि योग बन रहा है। इसका प्रभाव देश, राज्य एवं समस्त जनों के लिए बहुत ही शुभ और कल्याणकारी होगा। आपस में मेलजोल और सामाजिक सौहार्द्र कायम होगा।

राख स्नान से मिलेगी रोगों से मुक्ति

होली के दिन गेहूं की बाली भी होलिका में भूनें, इसके बाद भुनी हुई बाली सबको वितरित करें। गेहूं की फसल का प्रथम भोग भगवान को अर्पित करें। पंडित रितेश तिवारी ने बताया कि होलिका की राख ठंडी होने पर उसे ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: का जाप करते हुए शरीर के अंगों पर लगाएं इससे चर्म रोग दूर हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि मेष, वृष, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, धनु, कुंभ राशि वालों के लिए यह होली लाभदायक होगी।

आॅस्ट्रेलिया की विक्टोरिया गैलेरी में है कोटा की 1844 की दुर्लभ होली पेंटिंग

रियासतकालीन होली : हाथी पर सवार होकर फव्वारे से होली खेलते थे महाराव

रियासतकाल में कोटा की होली की अपनी एक पहचान रही है। इतिहासकार डॉ. जगत नारायण ने अपनी पुस्तक महाराव उम्मेदसिंह और उनका समय पुस्तक में इसका जिक्र किया है। डॉ. नारायण के अनुसार महाराव उम्मेदसिंह के समय होली में शरीक होने के लिए कोटा की जनता चंबल के दोनों किनारों पर उमड़ती थी।

कोटा में हाथियों की होली जनता के मनोरंजन का सबसे बड़ा कार्यक्रम होता था। इस होली के नाम से लोग महाराव उम्मेदसिंह की जिंदादिली, जन प्रेम एवं लोकप्रियता को आज भी याद करते हैं। इस होली में पहले महाराव गढ़ में आकर पतंगी रंग की नई पोशाक व लपेटा धारण कर 12 बजे दिन में जनानी ढयोढ़ी के चंद्रमहल में महाराणी व राणीजी के साथ होली खेलते थे। इसके बाद महाराव अपने हाथी पर बैठकर ठिकानेदारों के साथ होली खेलने निकलत थे। महाराव बड़े-छोटे सभी व्यक्तियों से समानता से होली खेलते थे। सरदारों आदि के हाथी दरबार के हाथी के सामने आ जाते तब दरबार सभी पर गुलाल की पोटली व गुलाल गोटा फेंक कर होली खेलते थे। दरबार के हाथी के साथ फव्वारा रहता था। जिसको चलाने के लिए उस्ताद, कारीगर व मिस्त्री व पानी भरने के लिए 40-50 भिश्ती मौजूद रहते थे। फव्वारे से दरबार सभी पर रंग डालते थे। सवारी गढ़ से पाटनपोल, घंटाघर, रामपुरा होती हुई लाडपुरा तक जाती थी। शाम को बृजविलास में दावत होती थी। होली नहाण पर सुबह और शाम को दरी खाना होता था।

कोटा की होली की अपने समय में खास पहचान थी। पूर्व महाराव रामसिंह द्वितीय के समय की होली की दुर्लभ पेंटिंग आॅस्ट्रेलिया के विक्टोरिया आर्ट गैलेरी में सुरक्षित है। अभिमन्यु सिंह बंबूलिया बताते हैं कि हाथियों की होली की पेंटिंग उनके रिश्तेदार परीक्षित सिंह ने आॅस्ट्रेलिया से मोबाइल पर भेजी है। उन्होंने बताया कि पूर्व महाराव रामसिंह की 1844 की इस पेंटिंग में हाथियों पर होली खेलने के रामपुरा का दृश्य बताया है। पूर्व महाराव हाथियों पर सवार होकर पिचकारी चलाते हुए होली खेल रहे हैं, वहीं महिलाएं छतों पर से गुलाल उड़ेल रही हैं। महाराव के साथ प्रमुख पलायथा, कुन्हाड़ी, कोयला के ठिकानेदार सहित मयाराम धाबाई, लाला देवताजी छोटा का जिक्र किया गया है।