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देश में 77 साल चला था दो आने का चांदी का सिक्का, 100 साल पहले एक अप्रैल को ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था बंद

77 साल तक देश में दो आने का चांदी का सिक्का चलने के बाद अचानक एक अप्रैल 1918 को देश में इसे बंद कर दूसरी धातु कॉपर और निकल...

Dainik Bhaskar

Apr 01, 2018, 05:05 AM IST
देश में 77 साल चला था दो आने का चांदी का सिक्का, 100 साल पहले एक अप्रैल को ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था बंद
77 साल तक देश में दो आने का चांदी का सिक्का चलने के बाद अचानक एक अप्रैल 1918 को देश में इसे बंद कर दूसरी धातु कॉपर और निकल से बनाकर प्रचलित कर दिया। 1841 में सबसे पहले विक्टोरिया क्वीन के समय दो आने का चांदी का सिक्का जारी किया गया था, जो क्रमश: 1918 तक प्रचलन में रहा। किंग जॉर्ज पंचम (1911-1936) ने इस सिक्के में बदलाव किया था।

नोट व क्वाइन एक्सपर्ट डॉ. एसके राठी बताते हैं कि 2 आने के सिक्के को एक अप्रैल रविवार को 100 साल हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि उस समय में टकसाल में तैयार किए गए ये सिक्के शुद्ध चांदी में ढाले जाते थे। सबसे बड़ी बात यह रही कि फर्स्ट वर्ल्ड वार के समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भुगतान की प्रक्रिया चांदी के सिक्कों में ही करनी पड़ती थी। इससे तब चांदी की मात्रा में कमी हो गई थी। ऐसे हालत में उस समय इस धातु के सिक्के बनाना बंद कर दिया और ईस्ट इंडिया कंपनी ने तांबे और निकल धातु से सिक्के बनवाए। इनमें 75 प्रतिशत तांबा और 25 प्रतिशत निकल का इस्तेमाल किया गया। दो आने के सिक्के 1947 तक प्रचलन में रहे।

क्वाइन कलेक्टर सौरभ लोढ़ा बताते हैं कि चांदी, निकल और तांबे का 1947 तक प्रचलित सिक्के उनके कलेक्शन में शामिल है। वर्तमान में चांदी के सिक्के की कीमत एक हजार रुपए से अधिक है। डॉ. राठी बताते हैं कि एक अप्रैल को किए गए इस बदलाव में सबसे बड़ी रोचक बात रही कि अचानक हुए निर्णय से लोगों ने तब इसे अप्रैल फूल तक समझ लिया था, लेकिन हकीकत में इसके सिक्के में बदलाव किया गया था।

देश में 1841 से विक्टोरिया क्वीन के समय प्रचलित हुए थे चांदी के सिक्के

चांदी का दो आने का सिक्का।

सिटी रिपोर्टर | कोटा

77 साल तक देश में दो आने का चांदी का सिक्का चलने के बाद अचानक एक अप्रैल 1918 को देश में इसे बंद कर दूसरी धातु कॉपर और निकल से बनाकर प्रचलित कर दिया। 1841 में सबसे पहले विक्टोरिया क्वीन के समय दो आने का चांदी का सिक्का जारी किया गया था, जो क्रमश: 1918 तक प्रचलन में रहा। किंग जॉर्ज पंचम (1911-1936) ने इस सिक्के में बदलाव किया था।

नोट व क्वाइन एक्सपर्ट डॉ. एसके राठी बताते हैं कि 2 आने के सिक्के को एक अप्रैल रविवार को 100 साल हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि उस समय में टकसाल में तैयार किए गए ये सिक्के शुद्ध चांदी में ढाले जाते थे। सबसे बड़ी बात यह रही कि फर्स्ट वर्ल्ड वार के समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भुगतान की प्रक्रिया चांदी के सिक्कों में ही करनी पड़ती थी। इससे तब चांदी की मात्रा में कमी हो गई थी। ऐसे हालत में उस समय इस धातु के सिक्के बनाना बंद कर दिया और ईस्ट इंडिया कंपनी ने तांबे और निकल धातु से सिक्के बनवाए। इनमें 75 प्रतिशत तांबा और 25 प्रतिशत निकल का इस्तेमाल किया गया। दो आने के सिक्के 1947 तक प्रचलन में रहे।

क्वाइन कलेक्टर सौरभ लोढ़ा बताते हैं कि चांदी, निकल और तांबे का 1947 तक प्रचलित सिक्के उनके कलेक्शन में शामिल है। वर्तमान में चांदी के सिक्के की कीमत एक हजार रुपए से अधिक है। डॉ. राठी बताते हैं कि एक अप्रैल को किए गए इस बदलाव में सबसे बड़ी रोचक बात रही कि अचानक हुए निर्णय से लोगों ने तब इसे अप्रैल फूल तक समझ लिया था, लेकिन हकीकत में इसके सिक्के में बदलाव किया गया था।

1918 में जारी हुआ था सोने का 15 रुपए का सिक्का

मुंबई के टोडीवाला ऑक्शंस के फारुख एस टोडीवाला ने बताया कि 100 साल पहले 1918 में देश में मुंबई मिंट में 15 रुपए का सोने का सिक्का पहली बार तैयार किया गया था। तब इसकी कीमत 15 रुपए आंकी थी। यह शुद्ध सोने से निर्मित के अलावा इसका वजन 7.98 ग्राम और साइज 22.2 एमएम थी। देश में करीब ऐसे दुर्लभ सिक्के करीब तीन-चार हजार है। वर्तमान में इसकी कीमत करीब डेढ़ लाख रुपए तक आंकी गई है।

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