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एक-दो साल की उम्र में ही गूंगे-बहरे होने का पता लग जाए तो बेहतर इलाज संभव

बच्चों की जन्म के समय की सुनने की क्षमता की जांच किया जाना आवश्यक है। ओएई नाम की यह जांच मात्र 500 रुपए में सभी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 02, 2018, 05:10 AM IST

एक-दो साल की उम्र में ही गूंगे-बहरे होने का पता लग जाए तो बेहतर इलाज संभव
बच्चों की जन्म के समय की सुनने की क्षमता की जांच किया जाना आवश्यक है। ओएई नाम की यह जांच मात्र 500 रुपए में सभी स्थानों पर आमतौर पर उपलब्ध होती है। एक या दो साल की उम्र में बच्चे के बहरे व गूंगे व बहरे होने का पता लगे तो उसका बेहतर इलाज किया जा सकता है। कॉकलियर इंप्लांट के बेहतर परिणाम सामने आते हैं। यह बात रविवार को ईएनटी सर्जन्स की दो दिवसीय काॅन्फ्रेंस में भाग लेने आए दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल के ईएनटी विशेषज्ञ शरद माहेश्वरी ने कही।

उन्होंने कॉकलियर इंप्लांट के बाद होने वाले काॅम्प्लीकेशन व उनके बचाव के बारे में डॉक्टरों को बताया। उन्होंने कहा कि कॉकलियर इंप्लांट के बाद बच्चों में इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है। डिवाइस फेलियर हो सकता है। इसके लिए ऑपरेशन में विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में 6.3 प्रतिशत बच्चों में जन्मजात कम सुनने की समस्या होती है। इसके कई कारण होते हैं। डिलिवरी के समय बच्चों को कम ऑक्सीजन मिलना, गर्भवती महिला को होने वाला इन्फेक्शन व जींस की गड़बड़ी भी मुख्य कारण है।

सेमिनार में आॅपरेशन का डेमो दिखाते डाॅक्टर।

हियरिंग डिटेक्शन टेस्ट अभी केवल राज्य के 13 जिलों में

राजस्थान मेंे जयपुर सहित 13 जिलों में हियरिंग डिटेक्शन टेस्ट की सुविधा है। यह टेस्ट नेशनल कार्यक्रम के तहत किया जाता है। एसएमएस अस्पताल के ईएनटी विभाग में विशेषज्ञ डॉ. मोहनीष ग्रोवर ने बताया कि प्रदे सरकार को यह टेस्ट सभी जिलों में शीघ्र लागू करना चाहिए ताकि बच्चों के गूंगे-बहरे होने की समस्या में कमी आए। उन्होंने कहा कि घर पर यदि बच्चे की गतिविधियों पर ध्यान रखा जाए तो भी बच्चे की कम सुनने का पता लग सकता है। यदि बर्तन गिरने पर होने वाली आवाज से बच्चा उस तरफ नहीं देखे या कोई प्रतिक्रिया नहीं करे तो उसका हियरिंग टेस्ट करवा लेना चाहिए। जन्म के बाद बच्चे का ओएई टेस्ट करवाए तो कम सुनने की समस्या से हल हो सकती है।

कान का बाहरी हिस्सा नहीं होने पर भी लगाई जा रही है मशीन

बच्चों के सुनने की समस्या को समाप्त करने के उद्देश्य से बहां नामक मशीन लगाई जाने लगी है। यह जानकारी मुंबई के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. मिलिंद नवलखा ने दी। उन्होंने बताया कि इसके लिए केन्द्र व राज्य सरकार योजनाएं चल रही हैं। 8 लाख के खर्च से होने वाला कॉकलियर इंप्लांट बच्चों को योजना के तहत निशुल्क लगाया जाने लगा है।

क्विज व पैनल डिस्कशन हुए

ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. विक्रांत माथुर ने बताया कि काॅन्फ्रेंस में क्विज, पैनल डिस्कशन भी हुए। काॅन्फ्रेंस में ईएनटी विशेषज्ञों ने मौजूद डॉक्टरों को कॉकलियर इंप्लांट सहित अन्य इलाज के तरीकों की जानकारी दी। साथ ही डॉक्टरों ने कॉकलियर इंप्लांट की लाइव सर्जरी देखी। उन्होंने बताया कि चार कॉकलियर इंप्लांट किए गए। काॅन्फ्रेंस में डॉ. आरके.शर्मा, डॉ. अरूण पटेल, डॉ. राजकुमार जैन भी मौजूद थे। कार्यक्रम में पुणे, पटना, चंडीगढ़, मुंबई, दिल्ली, आगरा व फरीदाबाद के ईएनटी विशेषज्ञों ने भाग लिया। डॉ. माथुर ने बताया कि कॉकलियर इंप्लांट के लिए केन्द्र सरकार की योजना के तहत राजस्थान में दो केन्द्रों पर निशुल्क कॉकलियर इंप्लांट किए जा रहे हैं। इसमें से एक केन्द्र कोटा में हैं। योजना के तहत बच्चे की उम्र 5 वर्ष से कम व उसके परिवार के मुखिया की आय 15000 रुपए प्रतिमाह से कम होना आवश्यक है।

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