दुर्लभ बीमारी / आठ साल के बच्चे के पेट से निकाला तीन किलो का भ्रूण, डॉक्टरों ने समझी थी गांठ



दिनेश दिनेश
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  • डीबी अस्पताल में मंगलवार को सर्जरी के जरिए भ्रूण निकाला गया
  • सोनोग्राफी टेस्ट में पकड़ी गई बीमारी, सीटी स्कैन कराया तो भ्रूण होने की पुष्टि हुई

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 11:10 AM IST

चुरू (राजस्थान). चुरू के गांव मूंदड़ा के जगदीश मेघवाल के आठ साल के बेटे दिनेश के पेट में भ्रूण होने का चौंका देने वाला वाकया सामने आया है। पं. दीनदयाल उपाध्याय मेडिकल कॉलेज से जुड़े राजकीय डीबी अस्पताल में मंगलवार को सर्जरी के जरिए भ्रूण निकाला गया। इससे पहले बच्चे के पेट में भ्रूण देख डॉक्टरों के भी होश उड़ गए थे। भ्रूण अर्द्ध विकसित और मृत था, जो पेट में (ट्यूमर) गांठ की तरह दिख रहा था। हालात ये थे कि बच्चे का पेट काफी ज्यादा फूला हुआ था। ऐसा केस पांच लाख बच्चों में से एक में पाया जाता है।

चूरू के इतिहास में ये पहला मामला

  1. दिनेश दूसरी कक्षा का छात्र है। पेट में परेशानी होने पर बच्चे की सोनोग्राफी व सीटी स्कैन करवाया गया। ट्यूमर जैसे दिख रही गांठ के अंदर हडि्डयां, बाल, कोशिकाएं व एक बच्चे के विकसित होने वाली कोशिकाएं और सभी अंग दिखे तो डॉक्टर भी दंग रह गए। डॉक्टरों ने तुरंत तय किया कि बच्चे का ऑपरेशन करके पेट से ये भ्रूण हर हाल में निकालना पड़ेगा। चूरू के इतिहास में ये पहला मामला है।

  2. डीबी अस्पताल में करीब तीन घंटे तक ऑपरेशन किया गया। बच्चा अब आईसीयू में है और उसकी तबीयत अभी स्थिर है। आने वाले दो दिन उसके स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि ऐसी बीमारी पांच लाख में से एक बच्चे में होती है। दिनेश की सांस फूलती थी और उसे भूख भी नहीं लगती थी।

  3. बच्चे के जन्म से ही विकसित हो रहा था भ्रूण

    इस बीमारी को फिट्स इन फिटू कहा जाता है। ये बहुत ही रेयर होती है। जहां फिट्स अपने ही जुड़वा से जुड़ जाते हैं। यानी बच्चे के अंदर बच्चा पैदा होता है। जब मां के पेट में बच्चा बनता है तो तब उस बच्चे के अंदर बच्चा बनना शुरू हो जाता है। लेकिन वह डेवलप नहीं हो पाता।

  4. निकाले गए भ्रूण में आधा अधूरा सिर, लंबे बाल, पैर की बड़ी हड्‌डी, पंजे सहित अन्य अंग दिखाई दे रहे है। रोगी बच्चे के परिजनों ने बताया कि जब दिनेश एक साल का था, तभी उसका पेट बढ़ने लगा। परिजनों ने इसे सामान्य समझा। कई जगह दवा भी दिलाई लेकिन बीमारी का पता नहीं चल पाया, इसलिए पहले उपचार नहीं हो सका। 

  5. सबसे पहले रेडियोलॉजिस्ट डॉ. नायक ने पकड़ी बीमारी

    चार अप्रैल को डीबी अस्पताल के रेडियोलॉजिस्ट डॉ. बीएल नायक ने बच्चे के पेट में इस बीमारी को सबसे पहले पकड़ा। सोनोग्राफी कर काफी देर तक रिसर्च की तो डॉ. नायक को फाइनल पता लग गया कि ये कोई गांठ नहीं, बल्कि भ्रूण है। इन्होंने तुरंत डॉ. गजेंद्र सक्सेना को सोनोग्राफी कक्ष में बुलाया। सीटी स्कैन की रिपोर्ट में भ्रूण ही पाया गया।

  6. जल्दबाजी किए बिना भ्रूण निकालाः डॉ. खीचड़

    डॉक्टर महेंद्र खीचड़ ने बताया कि बच्चे के पेट से भ्रूण निकालना काफी कठिन रहा, क्योंकि भ्रूण आंतों के पीछे था। आंतों के पास छेद बनाकर जाना पड़ा। एक बड़ी धमनी व एक शिरा (वेन) आपस में भ्रूण से जुड़ी हुई थी। भ्रूण नसों में फंसा हुआ था। सभी डॉक्टर एक-एक चीज सोचकर व प्लानिंग से कर रहे थे। एक प्रतिशत भी जल्दबाजी नहीं की। 

  7. डॉक्टरों का कहना है कि अगर जल्दबाजी में नस कट जाती, तो आंतों व पेनक्रियाज की सप्लाई रुक जाती। डैमेज होने से बच्चा मर सकता था। पेनक्रियाज और अमाशय भी भ्रूण के साथ जुड़ा हुआ था। उस भ्रूण के चारों ओर खून की धमनियां फैली हुई थीं। इसलिए बिना किसी अंग को नुकसान पहुंचाए भ्रूण को पेट से बाहर निकालना काफी मुश्किल हो गया था। 

  8. पहले भ्रूण को उसी स्थिति में बाहर निकाला जैसे वह था। उसके बाद भ्रूण से जुड़े अंगों को उससे अलग करके वापस शरीर के उसी हिस्से में लगाया जहां उन्हें होना चाहिए। डॉक्टर गजेंद्र सक्सेना का कहना था कि तय किया गया कि पहले पेनक्रियाज को गांठ से अलग किया जाए। करीब आधा घंटा इसी में लग गया। इसके बाद जगह बनाकर गांठ को बाहर निकाला। बाद में सभी अंगों को वापस उसी जगह सेट किया गया। 

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