रेबीज की शिकार बच्ची को लेकर अस्पतालों में 8 घंटे भटका पिता
क्या है रेबीज?
रेबीज एक वायरस होता है। अगर यह किसी जानवर में फैला हो और वह जानवर हमें काट ले खासकर कुत्ता, बिल्ली या बंदर तो हमें रैबीज हो सकता है। रेबीज का वायरस सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर अटैक करता है, जिससे पीड़ित सामान्य नहीं रह पाता।
अधीक्षक का तर्क : डॉ. दुलारा के अनुसार शाम को ही मामला नॉलेज में आया और तब तक यह मरीज भर्ती हो चुका था। हमारे यहां स्वाइन फ्लू का आइसोलेशन वार्ड खाली है, उसमें एडमिट कर लिया। बच्ची को एडमिट करने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी।
लक्षण: पानी से डर (हाइड्रोफोबिया)
{ प्यास होने के बावजूद पानी नहीं पीना
{ बात-बात पर भड़क जाना
{ बर्ताव में हिंसक हो जाना
अधीक्षक का तर्क : डॉ. नवीन सक्सेना ने कहा- हमारे आइसोलेशन वार्ड में कोरोना संदिग्ध मरीज आ रहे हैं। हमारे डॉक्टरों का कहना था कि बच्ची 5 साल की है, उसकी डोज कौन तय करेगा। वैसे हमारे यहां भी एडमिट करना चाहिए था।
अधीक्षक का तर्क : अधीक्षक डॉ. सीएस सुशील ने कहा कि हमारे यहां बच्चों के आइसोलेशन की व्यवस्था नहीं है, इसलिए वहां भेजा होगा। वैसे भी हमारे यहां शिशु रोग विभाग में एकमात्र असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। ऐसे में मरीज की देखरेख में भी दिक्कत होती।
}जेकेलोन : डॉक्टर ने कहा कि एमबीएस अस्पताल के ही आइसोलेशन वार्ड में एडमिट करा दो, हम वहां जाकर देख लेंगे। परेशान परिजनों ने जनप्रतिनिधियों को कॉल किए, मामला प्रिंसिपल तक पहुंचा तो बच्ची को जेकेलोन अस्पताल के ही आइसोलेशन वार्ड में एडमिट कर लिया गया।
}एमबीएस : परिजन बच्ची को लेकर एमबीएस अस्पताल आए, यहां डॉक्टरों को दिखाया तो उन्होंने रैबीज का केस बताते हुए कहा कि यह छोटी बच्ची है, हमारे डॉक्टर इसका इलाज नहीं कर पाएंगे। नए अस्पताल वालों को ही भर्ती करना चाहिए था, अब जेकेलोन अस्पताल ले जाओ।
}न्यू मेडिकल कॉलेज : सुबह साढ़े 11 बजे बच्ची को परिजन वहां लेकर गए। डॉक्टरों ने 5 रुपए की पर्ची कटवाई और जैसे ही लक्षण पूछे और पता चला कि उसे रैबीज है तो तत्काल यह कहकर टाल दिया कि यहां आइसोलेशन वार्ड नहीं है, एमबीएस अस्पताल ले जाकर भर्ती कराओ।
कैसे टाला तीनों अस्पतालों में मरीज को, अब क्या कह रहे वहां के अधीक्षक
कैसे बचें रैबीज से : कुत्ता, बिल्ली या बंदर के काटने के 24 घंटे के अंदर एंटी-रैबीज टीकों के जरिए इलाज शुरू करवाएं। सरकारी क्षेत्र में सभी जगह उक्त टीके फ्री उपलब्ध होते हैं।
यह मामला शाम को ही ध्यान में लाया गया था। यह रवैया ठीक नहीं है। जहां तक मेरे ध्यान में है, तीनों ही अस्पतालों में आइसोलेशन की व्यवस्था है और नहीं है तो भी होनी चाहिए। इसे लेकर स्थायी व्यवस्था करेंगे। -डॉ. विजय सरदाना, प्रिंसिपल, मेडिकल कॉलेज
कोटा | रैबीज (हाइड्रोफोबिया) की शिकार 5 साल की बच्ची को एडमिट कराने के लिए उसका पिता शनिवार को 8 घंटे तक कोटा मेडिकल कॉलेज के तीनों अस्पतालों में भटकता रहा। नए अस्पताल से रोगी को एमबीएस भेज दिया, एमबीएस में बच्चा बताकर जेकेलोन भेज दिया। वहां से फिर एमबीएस ले जाने को कहा गया। मामला प्रिंसिपल तक पहुंचा, तब शाम करीब साढ़े 7 बजे बच्ची को जेकेलोन में एडमिट किया।
कोटा के विनोद कुमार ने बताया कि मेरे स्टॉक पर केबल नगर में काम करने वाले चेचट क्षेत्र के मजदूर की 5 साल की बेटी को करीब एक माह पहले गांव में ही कुत्ते ने काट लिया था। उसे गांव में ही इंजेक्शन भी लगवा लिए, लेकिन अब अचानक से उसे तकलीफ होने लगी। बच्ची पानी से डर रही है और पानी भी नहीं पी रही। उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।