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सेहत का सरकारी सिस्टम बे-हाल; एमबीएस में खराब पड़ी हैं कई जरूरी मशीनें, ठीक कराने की फुर्सत नहीं

Kota News - चिकित्सा विभाग में लाखों रुपए कीमत के उपकरणों की मेंटेनेंस का सरकारी ढर्रा आम मरीजों पर भारी पड़ रहा है। साल-सालभर...

Dec 08, 2019, 09:32 AM IST
Kota News - rajasthan news government system of health is good many important machines are defective in mbs no time to repair
चिकित्सा विभाग में लाखों रुपए कीमत के उपकरणों की मेंटेनेंस का सरकारी ढर्रा आम मरीजों पर भारी पड़ रहा है। साल-सालभर तक मशीनें ठीक नहीं हो पाती, नतीजतन मरीजों को प्राइवेट सेक्टर में पैसा खर्च कर जरूरी जांचें या इलाज कराना पड़ता है। संभाग के सबसे बड़े अस्पताल में कुछ प्रमुख मशीनों को लेकर भास्कर ने पड़ताल की तो सामने आया कि 3 महत्वपूर्ण मशीनें अरसे से खराब पड़ी हैं। बुलाने पर इंजीनियर नहीं आते, इंजीनियर आते हैं तो बजट का संकट आ जाता है और बजट मिलने पर टेंडर की प्रक्रिया में लंबा समय खिंच जाता है।

ज्यादा परेशान हो रहे भामाशाह मरीज : इन मशीनों के खराब होने से सर्वाधिक समस्या उन मरीजों को हो रही है, जो भामाशाह के पात्र है। असल में ऐसे मरीजों को एडमिट कर लिया जाता है, लेकिन जब उनकी उक्त में से किसी मशीन पर जांच की जरूरत होती है तो वह नहीं हो पाती। डॉक्टर ऐसे मरीज को बाहर से भी कोई जांच नहीं करा सकते, क्योंकि भामाशाह रोगी का कैशलेस इलाज करना होता है। ऐसे में कई दिन तक मरीज चक्कर काटता रहता है, फिर अंत में उसे प्राइवेट सेक्टर में जाकर अपने स्तर पर जांच करानी पड़ती है।


पड़ताल
ब्रेकी थैरेपी मशीन



रिपेयर में देरी क्यों : भाभा एटोमिक रिसर्च मुंबई से उसे रिपेयरेबल बताया गया। कुछ समय पहले इंजीनियर आए हैं, उपकरण के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की है।

समय पर उपकरण ठीक नहीं होने के 3 कारण

एएमसी-सीएमसी समय पर नहीं की जाती, अव्वल तो कई विभागों को यह भी पता नहीं होता कि एएमसी कब खत्म होने वाली है।

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आए दिन खराब हो जाते हैं उपकरण : उक्त प्रमुख उपकरणों के अलावा एमबीएस, जेकेलोन व न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में वेंटीलेटर, वार्मर, फोटोथैरेपी, एनीस्थिसिया मशीन, ओटी में यूज होने वाल जरूरी उपकरण आए दिन खराब होते रहते हैं, लेकिन ठीक होने में कई माह बीत जाते हैं। उपकरणों के मेंटीनेंस की पुख्ता व्यवस्था नहीं है।

प्रिंसिपल के निर्देश भी बेअसर

प्रिंसिपल डॉ. विजय सरदाना ने अस्पताल के आईटी सेल के प्रभारी निर्देश दिए थे कि कॉलेज व संलग्न अस्पतालों में जितने भी उपकरण है, उनकी एएमसी, सीएमसी के शेड्यूल व अन्य जानकारियां कंप्यूटराइज्ड करके रखें, ताकि हर विभाग अपडेट रहे। लेकिन अब तक यह काम नहीं हो पाया है।

एमबीएस में खराब पड़ी कैंसर विभाग की मशीन।

आरएमएससीएल के स्तर से खरीदी गई मशीनों के मामले में कंपनियांे के इंजीनियरों को बुलाने में काफी समय लग जाता है।

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ऐसा भी हो चुका है यहां

नए अस्पताल में समय पर बैट्रियां रिप्लेस नहीं करने की वजह से एक माह से ज्यादा समय तक एमआरआई मशीन बंद रही थी। पूरे चिकित्सा जगत में इसे मजाक के रूप में लिया गया था कि करोड़ों की मशीन को एक माह तक इसलिए बंद रखना पड़ गया कि बैट्रियां रिप्लेस नहीं हो पाई। इसे लेकर धरने-प्रदर्शन तक हुए और तब मशीन ऑन हो पाई।

मेंटेनेंस के लिए आरएमआरएस से ही बजट निकालना होता है। इसके लिए फाइल संभागीय आयुक्त के पास जाती है।

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टू डी ईको मशीन



रिपेयर में देरी क्यों : मशीन अारएमएससीएल से खरीदी गई थी, लंबे समय तक तो कंपनी के इंजीनियर ही नहीं आए। अब वे देख गए हैं और खर्च ज्यादा बताया है। अस्पताल प्रबंधन विचार कर रहा है कि इसे ठीक कराएं या पीपीपी मोड पर दूसरी मशीन लगाएं।

ईको लैब लंबे समय से बंद पड़ी है।

ईआरसीपी मशीन



रिपेयर में देरी क्यों : स्कोप बदलने पर करीब 10 लाख रुपए का खर्च आएगा। पहले तो इसे लेकर चिट्ठियां चलती रही, अब नए स्कोप की प्रक्रिया शुरू की गई है।

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