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शीतला सप्तमी अाज, अष्टमी कल; महिलाएं करेंगी व्रत-पूजन

एक वर्ष पहले
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हाेली के 8 दिन बाद अाने वाली शीतला सप्तमी रविवार अाैर अष्टमी साेमवार काे मनाई जाएगी। इस दिन शीतला माता काे बास्याेड़ा अाैर ठंडे भाेजन का भाेग लगाया जाएगा। इस दिन मां अपने बच्चाें की लंबी उम्र की कामना करने के िलए व्रत करेंगी अाैर सुबह जल्दी शीतला माता की पूजा करेंगी। यह ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देती है। इसके बाद से ग्रीष्म ऋतु की शुरुअात हाेती है।

शीतला सप्तमी से जुड़े कई लोक गीत है। उसी में से एक है – सीली शीतला ओ मांय, सरवर पूजती घर आय, ठंडा भुजिया चढ़ाय, सरवर पूजती घर आय – इसी प्रकार सभी व्यंजनों के नाम लिए जाते जो माता रानी की भोग के लिए बनाए जाते हैं। इस दिन ठंडा भोजन खाए जाने का रिवाज है। इसका धार्मिक कारण तो यह है कि शीतला मतलब जिन्हें ठंडा अतिप्रिय है।

इसीलिए शीतला देवी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें ठंडी चीजों का भोग लगाया जाता है। दरअसल शीतला माता के रूप में पंथवारी माता को पूजा जाता है। पथवारी यानी रास्ते के पत्थर को देवी मानकर उसकी पूजा करना। अष्टमी के दिन बासी पदार्थ ही देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है, और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इस कारण से ही संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से विख्यात है।

महिला ने कहा आ मां तेरे बाल संवार दूं। अचानक महिला की नजर बूढ़ी मां के बालों के अंदर छुपी सिर एक आंख पड़ी तो डर के मारे भागने लगी। तभी बूढ़ी मां ने कहा रुक जा बेटी, डर मत। मैं भूत प्रेत नहीं, शीतला देवी हूं। मैं देखने आई थी कि धरती पर मुझे कौन मानता है। कौन पूजा करता है। इतना कह माता असली रूप में प्रकट हुईं। महिला ने कहा- हे मां मेरे गरीब घर में न चौकी है, न आसन। कहां बिठाऊं। तब शीतला माता प्रसन्न होकर कुम्हारन के घर में खड़े गधे पर बैठ गई। एक हाथ में झाड़ू दूसरे में डलिया लेकर महिला की दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेंक दिया। कहा बेटी में तेरी भक्ति से प्रसन्न हूं, अब तुझे जो भी चाहिए मुझसे वरदान मांग ले।


शरीर में तपन है। शरीर में फफोले पड़ गए हैं। यह तपन सहन नहीं कर पा रही है। तब उस महिला ने कहा मां तू यहां आकार बैठ जा। महिला ने उस बूढ़ी माई पर खूब ठंडा पानी डाला और बोली मां मेरे घर में रात की बनी हुई राबड़ी रखी है, थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढ़ी माई ने ठंडी (ज्वार) के आटे की राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।


कौन हैं शीतला माता : स्कंद पुराण में माता शीतला का वर्णन है, जिसमें उन्हें चेचक रोग की देवी बताया गया है। उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि माता शीतला अपने हाथों में कलश, सूप, झाडू और नीम के पत्ते धारण किए हुए हैं। वे गर्दभ की सवारी किए हुए हैं। शीतला माता के साथ ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणुनाशक जल है।


को पूजा जाता है। पथवारी यानी रास्ते के पत्थर को देवी मानकर उसकी पूजा करना। अष्टमी के दिन बासी पदार्थ ही देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है, और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इस कारण से ही संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से विख्यात है।

शीतला माता की कथा से समझें ठंडा-बासी का महत्व

मान्यता है कि एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो देखूं कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डूंगरी गांव में आई और देखा कि इस गांव में मेरा मंदिर भी नहीं है, ना मेरी पूजा हाेती है। माता शीतला गांव की गलियों में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) नीचे फेंका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा, जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड़ गए। शीतला माता के पूरे शरीर में जलन होने लगी।

शीतला माता गांव में इधर-उधर भागकर चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा है। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गांव में किसी ने शीतला माता की मदद नहीं की गई। वहीं, अपने घर के बाहर एक कुम्हारन (महिला) बैठी थी। उस महिला ने देखा कि अरे यह बूढ़ी माई तो बहुत जल गई है। इसके पूरे शरीर में तपन है। शरीर में फफोले पड़ गए हैं। यह तपन सहन नहीं कर पा रही है। तब उस महिला ने कहा मां तू यहां आकार बैठ जा। महिला ने उस बूढ़ी माई पर खूब ठंडा पानी डाला और बोली मां मेरे घर में रात की बनी हुई राबड़ी रखी है, थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढ़ी माई ने ठंडी (ज्वार) के आटे की राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।

अखंड सुहाग बनाए रखना


माता ने दिखाया असली रूप

तब महिला ने हाथ जोड़ कर कहा कि माता मेरी इच्छा है अब आप डूंगरी गांव मे स्थापित होकर यही रहों। जैसे आपने मेरे घर की दरिद्रता झाड़ू से साफ़ की है। सप्तमी को भक्ति भाव से पूजा कर ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाए उसकी दरिद्रता को साफ़ करना, पूजा करने वाली महिला का सुहाग अखंड रखना। गोद भरी रखना। जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहां बाल ना कटवाए धोबी को कपडे धुलने ना दें और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नारियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करें, उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आए। उसी दिन से डूंगरी गांव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गांव का नाम हो गया शील की डूंगरी।

शीतला अष्टमी का महत्व : शीतला पूजा-अर्चना का विधान भी अनोखा है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए कई पकवान बनाए जाते हैं। अष्टमी पर बासी पकवान ही देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किए जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार आज भी अष्टमी के दिन कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और भक्त प्रसाद के रूप में बासी भोजन का ही आनंद लेते हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है, इसलिए अब यहां से आगे हमें बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।


शीतला माता की ऐसे करें पूजा-अर्चना

{प्रातः जल्दी उठें और सूर्योदय से पहले स्नान करें।

{ शीतला माता का स्मरण करें।

{ व्रत का संकल्प लें। शीतलाष्टक का पाठ करें।

{ देवी-देवताओं को प्रसाद चढ़ाएं।

{ प्रसाद में दही, राबड़ी, गुड़ और कई अन्य आवश्यक वस्तुएं शामिल करें।

{ इसके बाद, भक्त बुजुर्ग लोगों से दिव्य आशीर्वाद लेते हैं।

{ निर्धन लोग दान-पुण्य का कार्य करें।

शाम को पूजा के बाद व्रत खोलें।

हाेली के अाठ दिन बाद अाती है शीतला अष्टमी

शीतला अष्टमी पर बासी भोजन क्यों? : ज्योतिषाचार्य अमित जैन के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन शीतला माता की पूजा के समय उन्हें खास मीठे चावलों का भोग चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता को ठंडी चीजें बहुत प्रिय हैं। उनके लिए चावल गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं। इन्हें सप्तमी की रात को बनाया जाता है। अष्टमी यानी त्योहार के दिन ताजा खाना नहीं बनाया जाता है। यही नहीं, ये दिन ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देता है। ऐसा कहते हैं कि इस अष्टमी के बाद बासी खाना नहीं खाया जाना चाहिए।
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