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कोटा: मासूमों की सांसें अंबु बैग से चल रही हैं, 18 वेंटिलेटर खराब

जेकेलोन हॉस्पिटल में बड़ी संख्या में जीवनरक्षक उपकरण खराब, मरम्मत के लिए 6 माह में कंपनी को भी नहीं बुलाया

Danik Bhaskar | Aug 22, 2018, 06:27 AM IST

कोटा. जेकेलोन हॉस्पिटल के शिशु रोग विभाग में इन दिनों वेंटिलेटर और इंफ्यूजन पंप जैसे अहम उपकरण खराब हैं। इंफ्यूजन पंप के अभाव में आईसीयू में भर्ती नवजातों को अनुमान से दवा की डोज दी जा रही है।

वहीं वेंटिलेटर ज्यादातर खराब होने से एक साथ ज्यादा बच्चों को सांस में दिक्कत होने पर अंबु बैग से जुगाड़ करना पड़ता है। यह वही बड़ा अस्पताल है, जहां पूरे संभाग के शिशु रोगियों का इलाज होता है। उपकरणों को ठीक कराने के लिए पिछले कुछ माह से सिर्फ कागज काले किए जा रहे हैं। विभाग से चिट्ठी अधीक्षक कार्यालय को भेजी जाती है और अधीक्षक दफ्तर से कंपनियों व विभाग से पत्र व्यवहार चल रहा है, लेकिन 6 माह में वार्मर को छोड़ अन्य कोई उपकरण ठीक नहीं हो पाया। शिशु रोग विभाग में कार्यरत कर्मचारी बताते हैं कि उपकरणों की इतनी बुरी स्थिति विभाग में कभी नहीं रही।

नेबुलाइजर और फोटोथैरेपी जैसे बुनियादी उपकरण तक खराब

इंफ्यूजन पंप : नवजात बच्चों को दवा की डोज इंफ्यूजन पंप से दी जाती है। अस्पताल में करीब 60 इंफ्यूजन पंप है, इक्का-दुक्का ठीक से काम कर रहे हैं, शेष पंप खराब हैं।

वेंटिलेटर : यह जीवनरक्षक उपकरण है। महज 2 वेंटिलेटर ठीक कंडीशन में चल रहे हैं, शेष 18 नाकारा पड़े हैं। जो चल रहे हैं, उनमें भी कुछ फंक्शन ठीक से काम नहीं कर रहे। अस्पताल में 120 पलंग है और अक्सर सारे पलंग फुल रहते हैं।
मल्टी पैरामीटर : करीब 21 मल्टी पैरामीटर खराब हैं।

सीपेप व सक्शन मशीन : यह मशीन भी जीवनरक्षक उपकरण की श्रेणी में आती है। विभाग में 6 सीपेप मशीनें हैं, सभी खराब हैं। करीब 11 सक्शन मशीनें हैं, 1-2 ठीक है, शेष सभी खराब है। 4 में से 2 नेबुलाइजर भी खराब हैं।

फोटोथैरेपी मशीन : 20 में से 12 फोटोथैरेपी मशीनें खराब है। यह जन्मजात पीलिया ग्रस्त बच्चों के लिए जीवनदान साबित होता है।

कंपनियों को पत्र लिख व्यक्तिगत भी उनसे संपर्क कर रहे हैं। शिशु रोग विभाग के 3 डॉक्टरों की एक कमेटी बनाई है, जो इनके मेंटिनेंस को लेकर लगातार काम करेगी। - डॉ. एचएल मीणा, अधीक्षक, जेकेलोन हॉस्पिटल

हर उपकरण के लिए अधीक्षक को लिखा है। आगे का काम उन्हीं के स्तर पर होता है। ठीक होने के बाद हम ओके रिपोर्ट देते हैं। - डॉ. एएल बैरवा, एचओडी, शिशु रोग विभाग