परंपरा / 700 साल पुराने दड़ा उत्सव को देखने ग्रामीणों का सैलाब उमड़ा, खूब हुई जोर-आजमाइश

दड़ा खेलते ग्रामीण। दड़ा खेलते ग्रामीण।
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दड़ा खेलते ग्रामीण।दड़ा खेलते ग्रामीण।

  • पूरे डेढ़ घंटे जोर आजमाइश के बाद मुकाबला खत्म करने की घोषणा की गई
  • मकर संक्रांति पर दड़ा खेलने की शुरुआत करीब 700 साल पहले हाड़ा वंशजों ने की थी

दैनिक भास्कर

Jan 15, 2020, 11:02 AM IST

बूंदी. नमाना के बरूंधन में मंगलवार को ही मकर संक्रांति मानकर दड़ा खेलने की परम्परा निभाई गई। सुबह 11 बजे दड़े की पूजा-अर्चना की गई और फिर मूछों पर ताव लगाते हुए दड़े का महामुकाबला शुरू किया। पूरे डेढ़ घंटे जोर आजमाइश के बाद मुकाबला खत्म करने की घोषणा की गई।

मकर संक्रांति पर दड़ा खेलने की शुरुआत करीब 700 साल पहले हाड़ा वंशजों ने की थी। दड़ा उत्सव को देखने ग्रामीणों का सैलाब उमड़ पड़ा। हाड़ा परिवार के श्यामसिंह हाड़ा, नंदसिह हाड़ा, भंवरसिंह हाड़ा ने मंगलवार सवेरे गाजेबाजे के साथ खिलाड़ियों की मनुहार की। फिर राजपूत मोहल्ले से दड़ा मुख्य बाजार में लक्ष्मीनाथ मंदिर के सामने खेलस्थल पर लाया गया। हाड़ा परिवार के सदस्यों ने दड़े की विधिवत पूजा-अर्चना कर खेल शुरू करने की घोषणा की। युवाओं के उत्साह को देख बुजुर्ग भी मूछों पर ताव देते नजर आए। धक्का-मुक्की, खींचतान चलती रही। कुछ युवकों को मुकाबले के दौरान गिर जाने से हल्की चोटें भी आई।

मुकाबले के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं, युवतियां रंग-बिरंगे परिधानों में सज-धज कर छतों से खेल का आनंद लेते हुए फूल बरसाकर टीमों का हौसला बढ़ाती रही। इस बार दड़े का वजन करीब 40 किलो था। मुख्य बाजार मैदान था।


ढोल की थाप भरती रही खिलाड़ियों में जोश 

खेल के दौरान ढोल पर पड़ने वाली थाप खिलाड़ियों में जोश भरती रही। ढोल पर थाप राव वंशज देते हैं। सत्यनारायण राव व रामाराव ने बताया कि खेल शुरू होने से पहले ढोल की थाप पर हाड़ा परिवार के खिलाड़ियों को जोश दिलाया जाता है। जीतने के बाद ढोल पर नाचे। 

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