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सात दिन में 7 दर्जन से ज्यादा शव मिले, तस्करी के लिए मोर का जहरीले दाने से हो रहा शिकार

भास्कर संवाददाता | कुचामन सिटी/बोरावड़/जसवंतगढ़। राष्ट्रीय पक्षी मोर के शिकार की घटनाएं थम नहीं रही हैं। एक...

Dainik Bhaskar

Jun 05, 2018, 05:05 AM IST
सात दिन में 7 दर्जन से ज्यादा शव मिले, तस्करी के लिए मोर का जहरीले दाने से हो रहा शिकार
भास्कर संवाददाता | कुचामन सिटी/बोरावड़/जसवंतगढ़।

राष्ट्रीय पक्षी मोर के शिकार की घटनाएं थम नहीं रही हैं। एक सप्ताह में मकराना-परबतसर क्षेत्र में 7 दर्जन से ज्यादा मोरों की मौत हो चुकी है। पोस्टमार्टम में मौत का कारण जहरीला दाना बताया है। इसमें मोरों के शिकारी और तस्करों का हाथ होने की संभावना जताई जा रही है। दाबड़िया के दुजोट की नाडी में सोमवार को 40 मोर मरने की सूचना है। जिनमें से 22 शव बरामद किए है। कुछ शव को जंगली जानवरों ने नोंच लिया था। वन विभाग की टीम ने मौके पर ही मेडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम करवाया। विसरा सैंपल अजमेर फोरेंसिक जांच के लिए भेजा। इससे पहले खोखर, बांसड़ा, हुड़िया में भी करीब 3 दर्जन से ज्यादा मोर मृत मिले थे। दाबड़िया के ग्रामीणों ने बताया कि सुबह दौड़ लगाने वाले युवकों ने बालाजी मंदिर के पास बड़ी संख्या में मरे मोर देखे। इसकी सूचना सरपंच बुद्धाराम मेघवाल व ग्रामीणों को दी। ग्रामीणों ने डीडवाना क्षेत्रीय वन अधिकारी नानकसिंह को दी। उन्होंने शव कब्जे में लिए। डॉ. देवेंद्र गोदारा, डॉ. वीएस देशपांडे, डॉ. सुनील किरड़ोलिया के मेडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम के बाद शवों का अंतिम संस्कार करवाया। प्रथमदृष्टया मोरों की मौत जहरीले दाने से होने की संभावना है। डीएफओ मोहित गुप्ता भी मौके पहुंचे। उन्होंने वायरस के प्रकोप की संभावना जताई है। ग्रामीणों ने मोरों की मौत मामले में कार्रवाई में ढिलाई बरतने का आरोप लगाया।

पड़ताल मोरों की तस्करी का संदेह, मांस में नहीं होता जहरीले दाने का असर

बड़ी संख्या में मोरों की मौत का मामले में दैनिक भास्कर ने पड़ताल की तो चौंकाने वाली बात सामने आई। जानकारी अनुसार मोर के मांस की तस्करी के लिए बड़ी संख्या में मोर का शिकार किया जा रहा है। इसके पीछे माना जा रहा है कि मोर का मांस काफी महंगे भावों में बिक्री किया जाता है। पशु चिकित्सक डॉ. देवेंद्र गोदारा ने बताया कि संभावना है कि शिकारियों द्वारा जहरीले दाने से मोर की मौत के बाद शिकारी उसके पाचन तंत्र को निकाल कर नष्ट कर देते हैं, ऐसे में इस जहर का प्रभाव मांस सेवन करने वाले व्यक्ति को प्रभावित नहीं कर पाता।

डीएफओ बोले- मोरों की मौत चिंता का विषय, वायरस या तस्करी की संभावना

डीएफओ मोहित गुप्ता ने बताया कि नाडी के पास मंदिर में डाले जा रहे दाने और पानी को भी जांच के लिए भेजा है। जहरीले दाने का संदेह है। शिकारियों के सक्रिय होने से इनकार नहीं किया जा सकता। बीमारी अथवा वायरस का प्रकोप भी हो सकता है। परबतसर में गेहूं के दानों में पेस्टीसाइटस मिलाकर डाला गया। आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। रिमांड के बाद जेल भेज दिया है। बंदूक से शिकार का मामला भी आया। दूसरे प्रकार का मामला दाबड़िया में आया है। उन्होंने बताया कि मंदिर के पास बड़ी संख्या में मोरों की मौत को लेकर ग्रामीणों ने किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के बारे में जानकारी से इनकार किया है। मंदिर के पीछे जो दाना डाला जा रहा था, उसका भी सैंपल लिया गया है। हो सकता है गलती से पेस्टीसाइट के दाने डाले गए हो। इसके अलावा तस्करी के मामले में भी तफ्तीश की जा रही है। पुलिस का सहयोग लिया जा रहा है। पानी को साफ करने वाली दवाई डलवाई है। अब तक जो दाने डाले जा रहे हैं उनको हटवाया है।

परबतसर, मकराना के बाद अब जसवंतगढ़ में मिल रहे शव, दाबड़िया में 22 मोरों के शव बरामद, जानवरों ने नोंचा

बोरावड़. मृत मोरों के शव और मौके पर खड़े ग्रामीण।

छह दिन से लगातार सामने आ रहे हैं मोरों की मौत के मामले, वन विभाग के अधिकारी चुप

शिकारियों पर कार्रवाई नहीं होने के चलते डीडवाना तथा परबतसर रेंज में मोरों के शिकार का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। 6 दिन में करीब 90 मृत मोर मिल चुके हैं। 29 मई को खोखर में 33 मोरों की मौत की सूचना आई। 1 जून को मकराना के बासड़ा में 2 मोरों का बंदूक से शिकार मामले में ग्रामीणों ने 1 आरोपी को पकड़ कर पुलिस के हवाले किया। 2 जून को हुड़िया में 4 मृत तथा 1 घायल मोर मिला। सोमवार को भी 40 मोरों की मौत हो गई।

कसूंबी में 4 दिनों में 2 दर्जन मोर की मौत

जसवंतगढ़|
4 दिन में कसूंबी में 2 दर्जन से अधिक मोरों की मौत हो चुकी है। ग्रामीणों ने बताया कि मोर पहले घायल हो जाता है। पेड़ से गिरने पर श्वानों का शिकार बन जाते हैं। गोपाल टेलर व मनमोहन ने बताया कि बस स्टैंड पुलिया के पास 3 दिनों में 11 मोरों की मौत हुई। मुकेश सैन ने बताया कि जोहड़ में पिछले 3-4 दिनों से मोर मरे नजर आए। इस बारे में वन विभाग के अधिकारियों को कई बार अवगत कराने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

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