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साहित्य अकादमी अध्यक्ष बोले- रामायण विश्व का पहला महाकाव्य, इसमें बताया सामाजिक समरसता का महत्व

भारतीय साहित्य में आदिकाल से लेकर सदैव सामाजिक समरसता का भाव रहा है। आज सब जगह सूक्ष्म हिंसा एवं परोक्ष हिंसा बढ़...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 01:55 PM IST

भारतीय साहित्य में आदिकाल से लेकर सदैव सामाजिक समरसता का भाव रहा है। आज सब जगह सूक्ष्म हिंसा एवं परोक्ष हिंसा बढ़ गई है। ऐसे में अहिंसा की आवश्यकता भी बढ़ गई है। ये बातें राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के अध्यक्ष डा. इंदुशेखर ने कहीं। वो बुधवार को जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के अहिंसा एवं शांति विभाग एवं योग एवं जीवन विज्ञान विभाग के तत्वावधान में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के प्रायोजन में भारतीय साहित्य में अहिंसा एवं सामाजिक समरसता विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विश्व का पहला महाकाव्य वाल्मीकि कृत रामायण है। इसमें भेदभाव को महत्व नहीं देकर सामाजिक समरसता को महत्व दिया गया

अहिंसा पर लाडनूं से घोषणा पत्र जारी हो

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महाराज गंगासिंह विश्वविद्यालय बीकानेर के कुलपति प्रो. भागीरथ सिंह बिजारणियां ने कहा कि भारतीय साहित्य में अहिंसा परमोधर्म एवं वसुधैव कुटुम्बकम से अहिंसा एवं सामाजिक समरसता की बातें स्पष्ट होती है। भारतीय संस्कृति में नैतिक मूल्य व जीवन मूल्य समाहित हैं। हमारी संस्कृति का आधार ही त्याग, ममता तथा जीयो और जीने दो की भावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय देश में अहिंसा का सबसे बड़ा केन्द्र है। यहां अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का अहिंसा एवं सामाजिक समरसता पर एक लाडनूं घोषणा पत्र जारी होना चाहिए।

वक्ता बोले- भारतीय साहित्य के हर ग्रंथ में दिया है अहिंसा का संदेश

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता वर्धमान महावीर विश्वविद्यालय कोटा के पूर्व कुलपति प्रो. नरेश दाधीच ने कहा कि साहित्य में अभी तक अहिंसा विमर्श शुरू नहीं हुआ है। भारतीय संदर्भ में अहिंसा का सिद्धांत जैन व बौद्ध धर्म का माना जाता है, लेकिन भारतीय साहित्य के हर ग्रंथ में अहिंसा का उल्लेख किसी न किसी रूप में मिलेगा। कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि प्रख्यात चिंतक व लेखक हनुमान सिंह राठौड़ ने अहिंसा व सामाजिक समरसता को अलग-अलग नहीं बताकर उनके मूल में एक ही भावना बंधुता को बताया। बंधुता आने पर समता आएगी और समता से समरसता आएगी। इससे पूर्व जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के शोध निदेशक प्रो. अनिल धर ने कहा कि साहित्य सृजन केवल मानसिक विलासिता नहीं है। इसमें दृष्टि आत्म कल्याण एवं पर कल्याण की रहती है। यहां साहित्य रचना की दृष्टि स्वार्थपरक व वस्तुपरक नहीं रही है, केवल आत्म-कल्याण व परोपकार की रही है। डा. जुगल किशोर दाधीच ने स्वागत किया। अंत में योग व जीवन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डा. प्रद्युम्न सिंह शेखावत ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम में दूरस्थ शिक्षा निदेशक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, समाज कार्य विभाग के निदेशक डॉ.. बी. प्रधान, डॉ.. हरिराम परिहार, डॉ.. सुमन मौर्य, प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा, डॉ.. सुरेन्द्र सोनी चूरू, डॉ.. गजादान चारण, सूरज सोनी, डॉ.. रेखा तिवाड़ी, डॉ.. रूचि मिश्रा, बबिता आदि उपस्थित थे।

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