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मासूमों से दुष्कर्म के खिलाफ... फांसी का पहला फैसला

अपराधी पिंटू (19) भास्कर न्यूज | अलवर आखिरकार...मासूम बच्चियों से दुष्कर्म पर फांसी का पहला फैसला आ ही गया। सात माह...

Dainik Bhaskar

Jul 22, 2018, 05:10 AM IST
मासूमों से दुष्कर्म के खिलाफ... फांसी का पहला फैसला
अपराधी पिंटू (19)

भास्कर न्यूज | अलवर

आखिरकार...मासूम बच्चियों से दुष्कर्म पर फांसी का पहला फैसला आ ही गया। सात माह की दुधमंुही बच्ची से दुष्कर्म के आरोपी 19 साल के पिंटू डाकोत को अदालत ने शनिवार को फांसी की सज़ा सुना दी। मामला अलवर का है। 9 मई, 2018 को अलवर के लक्ष्मणगढ़ थाना क्षेत्र में रहने वाला पिंटू पड़ोस की 7 माह की बच्ची को खिलाने के बहाने ले गया। बच्ची तब अपनी ताई के साथ थी। ताई दृष्टिहीन थी। बच्ची की मां और दादी पानी लेने के लिए बाहर गए हुए थे। जब वे लौटीं तो उन्हें बच्ची नहीं मिली। तलाश किया तो गांव के मैदान में बच्ची लहूलुहान हालत में मिली। ग्रामीणों को देखकर पिंटू मौके से भाग गया। बाद में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। 73 दिन पुरानी घटना में अदालत ने तेजी दिखाते हुए सिर्फ 14 पेशियों में गुनहगार का फैसला कर दिया। दंड विधि संशोधन अध्यादेश 2018 के लागू होने के बाद प्रदेश में 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले में फांसी की यह पहली सजा है। केस विशिष्ट न्यायाधीश जगेंद्र अग्रवाल (अनुसूचित जाति, जनजाति प्रकरण एवं पॉक्सो अधिनियम) की कोर्ट में चला। 20 जून को चार्जशीट के बाद त्वरित सुनवाई शुरू हुई। आरोपी को अदालत ने धारा 376 एबी में फांसी की सजा सुनाई है। इसके अलावा धारा 363 में पांच साल की कठोर सजा और 10 हजार का जुर्माना लगाया है। जुर्माना नहीं भरने पर एक साल का साधारण कारावास अलग। आरोपी को धारा 366 में 7 साल का कठोर कारावास और 20 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना नहीं देने पर दो साल का साधारण कारावास अलग।

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जो सिर्फ हंसना और रोना ही जानती है। उसके साथ ऐसा कृत्य मानवता को शर्मसार करने वाला है। जब वह सोचने-समझने में सक्षम होगी। तब उसे महसूस होगा कि धरती पर जन्म लेना उसके लिए अभिशाप था। यदि कारावास की सजा ही दी गई तो गलत संदेश जाएगा। मात्र मृत्यु दंड ही न्यायोचित है। -जज जगेन्द्र अग्रवाल फैसला सुनाते वक्त।

हर जिले में पाॅक्सो कोर्ट और मासूम बच्चियों के गुनहगारों को फांसी जैसी सख्त सज़ा के लिए भास्कर की लगातार मुहिम

10 जून को प्रकाशित

न्याय जीत गया। माननीय अदालत ने सर्वोच्च सज़ा सुनाते हुए यह संदेश दिया है कि हमारे समाज में ऐसी विकृत सोच के लिए जगह नहीं है। यह आत्म विश्लेषण का समय है ताकि हर परिवार अपने बेटों को यह सिखाए कि बेटियां कितनी मूल्यवान हैं।
13 जून को प्रकाशित

4 जुलाई को प्रकाशित।

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