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एंटी-इनकमबेंसी, अंदरूनी संघर्ष व जातीय समीकरणों ने िबगाड़ा भाजपा का खेल

1. एंटी-इनकमबेंसी : केन्द्र और राज्य की नीितयों के िखलाफ जनता नाराज है। इस वजह से शहरी वोटर भी भाजपा से दूर हुए। यही...

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 05:50 AM IST
एंटी-इनकमबेंसी, अंदरूनी संघर्ष व जातीय समीकरणों ने िबगाड़ा भाजपा का खेल
1. एंटी-इनकमबेंसी : केन्द्र और राज्य की नीितयों के िखलाफ जनता नाराज है। इस वजह से शहरी वोटर भी भाजपा से दूर हुए। यही वजह रही कि जिन 17 विधानसभा सीटों पर पोलिंग हुई वहां सभी जगह भाजपा हारी। संघ ने भी इन चुनावों में प्रचार से खुद को दूर रखा। कर्मचारियों और डॉक्टरों की हड़ताल से लोग परेशान हुए। सरकार इन मुद्दों को नहीं सुलझा सकी। इससे सरकार के खिलाफ माहौल बना।

2. अंदरूनी संघर्ष : टिकटों को लेकर पार्टी में आखिर तक िववाद बना रहा। अलवर में कैबिनेट मंत्री जसवंत यादव को टिकट दिया। उनकी छवि अच्छी नहीं थी। पार्टी के विधायक नाराज थे।

3. राजपूतों की नाराजगी : आनंदपाल व पद्मावत फिल्म के मुद्दे पर राजपूतों की नाराजगी को सरकार नहीं भांप सकी। कांग्रेस ने इसे अपने वोट में कैश किया। सरकार के पास 24 राजपूत विधायक हैं।

हार-जीत के 3 बड़े कारण

एकजुटता और हर सीट पर अलग रणनीति ने दिलाई कांग्रेस को जीत

1. कांग्रेस नेताओं की एकजुटता युवा प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट की राजनीितक सूझबूझ कमाल की रही। वे अशोक गहलोत और सीपी जोशी को एक साथ लेकर चले। यही नहीं अजमेर में रहकर उन्होंने मांडलगढ़ और अलवर पर भी निगाहें रखीं।

2. मेरा बूथ मेरा गौरव : पहली बार बूथ को मजबूत करने के लिए मेरा बूथ मेरा गौरव अभियान ने वोटरों और कार्यकर्ताओं को कनेक्ट िकया।

3. जीतने का जातीय समीकरण कांग्रेस ने तीनों सीटों के लिए अलग-अलग रणनीति बनाई। अजमेर में कांग्रेस जाट बनाम अन्य जातियां करने में कामयाब रही। राजपूत और ब्राह्मण को अपने पक्ष में रखा। अलवर में यादवों के साथ-साथ कांग्रेस ने अन्य जातियों को अपने पक्ष में लिया। वहीं मांडलगढ़ में बागी उम्मीदवार के बावजूद भाजपा के वोट बैंंक में सेंध लगाई।

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