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मनमोहन के पत्र में भरोसा खो चुकी कांग्रेस की आवाज

Mandal News - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धमकी भरी भाषा पर सज्जनता और शालीनता की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले पूर्व...

Dainik Bhaskar

May 16, 2018, 05:15 AM IST
मनमोहन के पत्र में भरोसा खो चुकी कांग्रेस की आवाज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धमकी भरी भाषा पर सज्जनता और शालीनता की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को लिखा गया पत्र नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित होने जा रहा है। निश्चित तौर पर हुबली में 6 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि कांग्रेस के नेता कान खोल कर सुन लीजिए, अगर सीमाओं को पार करोगे तो यह मोदी है लेने के देने पड़ जाएंगे, एक धमकी भरा बयान है। पर विडंबना यह है कि जनता को मोदी का ही पक्ष सही लग रहा है और कांग्रेसी नेताओं के सवाल गैर-वाजिब। जनता को अगर सचमुच भ्रष्टाचार अखरता तो वह येदियुरप्पा और बेल्लारी के रेड्‌डी बंधुओं के साथ न खड़ी होती। कांग्रेसी नेताओं को समझना होगा कि उनसे कहां चूक हुई है और कैसे उनकी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो गई है। इसमें सामाजिक न्याय के हिमायती विपक्ष और संघ परिवार का सतत प्रचार तो है ही लेकिन, कांग्रेसी नेताओं द्वारा लोकतंत्र के महान उद्‌देश्यों के साथ किया गया छल भी कम जिम्मेदार नहीं है। डॉ. मनमोहन सिंह को याद रखना चाहिए कि जब 2009 के चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी ने उनके मौन का मजाक उड़ाया था तो किस तरह से जनता ने भाजपा को दंडित किया था। बल्कि मनमोहन सिंह ने अपने मौन से ही उसका जवाब दे दिया था। तब डॉ. मनमोहन सिंह को सिंग इज किंग कहा जाता था। लेकिन आज उस मध्यवर्ग ने मनमोहन सिंह को खारिज कर दिया है और उनकी पार्टी ने उदारीकरण के माध्यम से उसे जो दिया था वह उसे भूल चुका है। कांग्रेस ने मंडल-मंदिर से ध्वस्त अपने सामाजिक आधार को वैश्वीकरण से वापस लाने की कोशिश की थी और वह कुछ समय उसके साथ रहा भी। अब वह वहां चला गया है जहां धन और धर्म का सुखद आभास है। मोदी उसी मध्यवर्ग की भावनाओं के प्रतिनिधि हैं। इसलिए वे अगर कांग्रेस को हद में रहने और न रहने पर लेने के देने पड़ने की धमकी देते हैं तो उससे उनकी अनुयायी जनता प्रसन्न होती है। कांग्रेस जब तक इस मनोविज्ञान को नहीं समझेगी तब तक इस लोकतंत्र में उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनती रहेगी। कांग्रेस को जनता का पुराना भरोसा हासिल करना होगा, तभी उसकी बात सुनी जाएगी।

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