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अब नागौरी नस्ल के बैलों से ही करेंगे खेत में जुताई, जैविक खेती को भी देंगे बढ़ावा, ताकि मिले गुणवत्तायुक्त अनाज

भास्कर संवाददाता| मेड़ता सिटी (आंचलिक) मेड़ता महादेव गौशाला डांगावास अध्यक्ष रामजीवन डांगा ने खेती में...

Dainik Bhaskar

Aug 07, 2018, 06:10 AM IST
अब नागौरी नस्ल के बैलों से ही करेंगे खेत में जुताई, जैविक खेती को भी देंगे बढ़ावा, ताकि मिले गुणवत्तायुक्त अनाज
भास्कर संवाददाता| मेड़ता सिटी (आंचलिक)

मेड़ता महादेव गौशाला डांगावास अध्यक्ष रामजीवन डांगा ने खेती में यांत्रिक संसाधनों एवं रसायनिक खेती को छोड़कर बैलों से खेत की जुताई करने एवं जैविक खाद का उपयोग करने का निर्णय लिया है। अध्यक्ष डांगा ने बताया कि वर्तमान में किसानों की ओर से खेती में अंधाधुंध डीजल का उपयोग कर खेत जुताई का कार्य करने के साथ में खेतों में रसायन खाद का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में उपजाऊ खेत बंजर हो रहे है। वहीं पर्यावरण को नुकसान हाे रहा है। उन्होंने बताया कि नागौरी नस्ल के बैल खेती में अत्यंत उपयोग है। लेकिन वर्तमान के आधुनिकीकरण के दौर के चलते नागौरी नस्ल के बैलों की उपेक्षा की गई है। इन बैलों की वर्तमान में उपयोगिता सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने कृषि फार्म में नागौरी नस्ल के बैलों से हल जोत कर खेत मेंं मूंग की फसल बोने के साथ में खेत उगी खरपतवार को हटाने का कार्य किया है। उन्होंने बताया कि बैल की मदद से खेत की जुताई और जैविक खेती करने पर किसान के खेत में पैदावार बढ़ेगी। वहीं शुद्ध अनाज का भंडारण हो सकेगा। गौरतलब है कि राज्य सरकार की ओर से प्रतिवर्ष मेड़ता, नागौर, परबतसर, पुष्कर, डीडवाना, बालोतरा, गोटन, डेगाना आदि स्थानों में नागौरी नस्ल के बैलों की खरीद-फरोख्त को लेकर मेलों का आयोजन होता रहा है। लेकिन खेती में लोग बैलों का उपयोग नहीं कर ट्रैक्टर व अन्य संसाधनों का उपयोग कर खेती करने के कारण आज मेलों की चमक फीकी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि नागौर नस्ल के बैलों का उपयोग खेत में करने पर फिर से मेलों की रौनक लौट आएगी। वहीं इन मेलों में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों के पशु पालकों एवं किसानों की आवक बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा यहां के किसानों को मिलेगा। आगामी दिनों में नागौरी नस्ल के बैल खेती के लिए वरदान साबित होंगे। वहीं रासायनिक खेती एवं यांत्रिक खेती पर विराम लगा कर पेट्रोल एवं डीजल की खपत को भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

पहल

गौशाला अध्यक्ष डांगा का निर्णय, कहा - रासायनिक खाद से खेत हो रहे हैं बंजर

भास्कर संवाददाता| मेड़ता सिटी (आंचलिक)

मेड़ता महादेव गौशाला डांगावास अध्यक्ष रामजीवन डांगा ने खेती में यांत्रिक संसाधनों एवं रसायनिक खेती को छोड़कर बैलों से खेत की जुताई करने एवं जैविक खाद का उपयोग करने का निर्णय लिया है। अध्यक्ष डांगा ने बताया कि वर्तमान में किसानों की ओर से खेती में अंधाधुंध डीजल का उपयोग कर खेत जुताई का कार्य करने के साथ में खेतों में रसायन खाद का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में उपजाऊ खेत बंजर हो रहे है। वहीं पर्यावरण को नुकसान हाे रहा है। उन्होंने बताया कि नागौरी नस्ल के बैल खेती में अत्यंत उपयोग है। लेकिन वर्तमान के आधुनिकीकरण के दौर के चलते नागौरी नस्ल के बैलों की उपेक्षा की गई है। इन बैलों की वर्तमान में उपयोगिता सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने कृषि फार्म में नागौरी नस्ल के बैलों से हल जोत कर खेत मेंं मूंग की फसल बोने के साथ में खेत उगी खरपतवार को हटाने का कार्य किया है। उन्होंने बताया कि बैल की मदद से खेत की जुताई और जैविक खेती करने पर किसान के खेत में पैदावार बढ़ेगी। वहीं शुद्ध अनाज का भंडारण हो सकेगा। गौरतलब है कि राज्य सरकार की ओर से प्रतिवर्ष मेड़ता, नागौर, परबतसर, पुष्कर, डीडवाना, बालोतरा, गोटन, डेगाना आदि स्थानों में नागौरी नस्ल के बैलों की खरीद-फरोख्त को लेकर मेलों का आयोजन होता रहा है। लेकिन खेती में लोग बैलों का उपयोग नहीं कर ट्रैक्टर व अन्य संसाधनों का उपयोग कर खेती करने के कारण आज मेलों की चमक फीकी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि नागौर नस्ल के बैलों का उपयोग खेत में करने पर फिर से मेलों की रौनक लौट आएगी। वहीं इन मेलों में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों के पशु पालकों एवं किसानों की आवक बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा यहां के किसानों को मिलेगा। आगामी दिनों में नागौरी नस्ल के बैल खेती के लिए वरदान साबित होंगे। वहीं रासायनिक खेती एवं यांत्रिक खेती पर विराम लगा कर पेट्रोल एवं डीजल की खपत को भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

भास्कर संवाददाता| मेड़ता सिटी (आंचलिक)

मेड़ता महादेव गौशाला डांगावास अध्यक्ष रामजीवन डांगा ने खेती में यांत्रिक संसाधनों एवं रसायनिक खेती को छोड़कर बैलों से खेत की जुताई करने एवं जैविक खाद का उपयोग करने का निर्णय लिया है। अध्यक्ष डांगा ने बताया कि वर्तमान में किसानों की ओर से खेती में अंधाधुंध डीजल का उपयोग कर खेत जुताई का कार्य करने के साथ में खेतों में रसायन खाद का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में उपजाऊ खेत बंजर हो रहे है। वहीं पर्यावरण को नुकसान हाे रहा है। उन्होंने बताया कि नागौरी नस्ल के बैल खेती में अत्यंत उपयोग है। लेकिन वर्तमान के आधुनिकीकरण के दौर के चलते नागौरी नस्ल के बैलों की उपेक्षा की गई है। इन बैलों की वर्तमान में उपयोगिता सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने कृषि फार्म में नागौरी नस्ल के बैलों से हल जोत कर खेत मेंं मूंग की फसल बोने के साथ में खेत उगी खरपतवार को हटाने का कार्य किया है। उन्होंने बताया कि बैल की मदद से खेत की जुताई और जैविक खेती करने पर किसान के खेत में पैदावार बढ़ेगी। वहीं शुद्ध अनाज का भंडारण हो सकेगा। गौरतलब है कि राज्य सरकार की ओर से प्रतिवर्ष मेड़ता, नागौर, परबतसर, पुष्कर, डीडवाना, बालोतरा, गोटन, डेगाना आदि स्थानों में नागौरी नस्ल के बैलों की खरीद-फरोख्त को लेकर मेलों का आयोजन होता रहा है। लेकिन खेती में लोग बैलों का उपयोग नहीं कर ट्रैक्टर व अन्य संसाधनों का उपयोग कर खेती करने के कारण आज मेलों की चमक फीकी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि नागौर नस्ल के बैलों का उपयोग खेत में करने पर फिर से मेलों की रौनक लौट आएगी। वहीं इन मेलों में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों के पशु पालकों एवं किसानों की आवक बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा यहां के किसानों को मिलेगा। आगामी दिनों में नागौरी नस्ल के बैल खेती के लिए वरदान साबित होंगे। वहीं रासायनिक खेती एवं यांत्रिक खेती पर विराम लगा कर पेट्रोल एवं डीजल की खपत को भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

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