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सर्किट हाउस के पास करोड़ों की जमीन, 21 साल बाद केस जीती सरकार, यहां बन सकता है मिनी सचिवालय

विभिन्न रेवेन्यु कोर्ट में करीब 21 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद अब सरकार के खाते में 50 करोड़ रुपए से अधिक...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:10 PM IST

विभिन्न रेवेन्यु कोर्ट में करीब 21 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद अब सरकार के खाते में 50 करोड़ रुपए से अधिक कीमत की जमीन आई है। सर्किट हाउस के पास 57 बीघा 9 बिस्वा भूमि को आरक्षित वर्ग द्वारा सामान्य वर्ग को बेचने पर 1996 में तत्कालीन नायब तहसीलदार ने सरकारी पैरोकार की हैसियत से राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 61 के तहत सिरोही तहसीलदार कोर्ट में यह मामला दर्ज कराया था। तहसीलदार कोर्ट से सरकारी भूमि होने की अधिसूचना जारी कर दी।

इसके बाद यह मामला रेवदर तहसील कोर्ट में स्थानांतरित हो गया। रेवदर तहसीलदार ने इसे माउंट आबू एसडीएम कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया। माउंट आबू एसडीएम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में डिग्री जारी कर दी। फिर यह मामला रेवन्यू अपील ऑथोरिटी पाली कोर्ट में गया, जहां माउंट आबू एसडीएम कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया। तत्पश्चात यह मामला रेवेन्यू बोर्ड अजमेर में गया। रेवेन्यू बोर्ड ने सिरोही तहसील कोर्ट को दुबारा मामला भेजकर पुन: सुनवाई को कहा। सिरोही तहसीलदार कोर्ट ने दिसंबर 2017 को श्रीसरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद तहसीलदार ने उक्त भूमि पर राजकीय बिलाराम भूमि होने का बोर्ड लगवा कर कब्जा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है।

1996 से तहसील कोर्ट, एसडीएम कोर्ट, आरएए पाली और रेवेन्यू बोर्ड अजमेर में चला केस, दिसंबर 2017 में आया था फैसला, प्रशासन ने अब लगाया अपना बोर्ड

जमीन सर्किट हाउस के बिल्कुल पास में, भविष्य की योजना के अनुसार यह बन सकता है मिनी सचिवालय या फिर नगर निकाय को दी जाए तो विकसित की जा सकती है कॉलोनी

सिरोही. सरकार के पक्ष में फैसला पक्ष में आने के बाद बोर्ड लगाते तहसीलदार।

मौके की जमीन, यहां बन सकता है मिनी सचिवालय

राजस्व विभाग ने 21 साल की कानूनी जंग लड़ने के बाद मौके की बेशकीमती जमीन को अपने हक में ले लिया है। डीएलसी दर के अनुसार इसकी कीमती 50 करोड़ रुपए से अधिक है। 57 बीघा 9 बिस्वा भूमि पर मिनी सचिवालय बन सकता है। सरकार ने जिला मुख्यालय पर मिनी सचिवालय स्वीकृत किया है। लेकिन, प्रशासन के पास मौके की जमीन नहीं होने से इसका काम शुरू नहीं हो पाया है। हालांकि यह भी संभावना है कि सरकार इस पर आवासीय कॉलोनी भी विकसित कर दे।

17 साल पहले भी लगा था बोर्ड, लेकिन हट गया

2000 में माउंट आबू एसडीएम कोर्ट की ओर से सरकार के पक्ष में फैसला देकर राजकीय बिलानाम भूमि होने की डिग्री जारी होने पर राजस्व विभाग ने उक्त भूमि पर बोर्ड लगवाया था, लेकिन किसी ने उसको हटा दिया। इसके बाद यह मामला विभिन्न रेवेन्यू कोर्ट में चलने के बाद एक बार फिर से इस नतीजे पर पहुंचा है और इस बार भी बोर्ड लगाया गया है।

सरकारी जमीन होने से बोर्ड लगा दिया है

उक्त भूमि सरकारी होने से हमने यहां बोर्ड लगा दिया है। इस बिलानाम भूमि पर अनधिकृत कब्जा करना कानूनी अपराध है। मौके पर किए गए अतिक्रमण के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। -अनुपसिंह, तहसीलदार, सिरोही

ऐसे चली 21 साल तक कानूनी जंग

1970 में सर्किट हाउस से सटी 57 बीघा 9 बिस्वा भूमि का नामांतरण वागाराम पुत्र पनाजी नाई निवासी मारवाड जंक्शन के नाम हुआ।

1970 में ही वागाराम ने इस भूमि को पुष्पमित्रसिंह पुत्र श्रीरामचंद्र मीणा को बेच दी।

1972 में पुष्पमित्रसिंह ने इस भूमि को गोपाल पुत्र वागाराम नाई को बेच दी।

1975 में गोपाल ने बाबला पुत्र जोधाजी भील निवासी जैला को बेच दी।

1996 में सिरोही के तत्कालीन नायब तहसीलदार ने सरकारी पैरोकार की हैसियत से सिरोही तहसीलदार कोर्ट में राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 61 के तहत दर्ज किया तथा सरकारी भूमि होने की अधिसूचना भी जारी करवा दी।

1997 में सिरोही तहसीलदार कोर्ट से यह केस रेवदर तहसीलदार कोर्ट में स्थानांतरित किया गया।

1997 में ही रेवदर तहसीलदार ने इस मामले को माउंट आबू एसडीएम कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया।

2000 में माउंट आबू एसडीएम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला देकर राजकीय बिलानाम भूमि होने की डिग्री जारी कर दी।

2001 में यह मामला रेवेन्यू अपील ऑथोरिटी पाली में चला गया। रेवेन्यू अपील ऑथोरिटी ने माउंट आबू के फैसले को बरकरार रखा।

2010 में यह मामला रेवेन्यू बोर्ड अजमेर में गया। रेवेन्यू बोर्ड ने इसको सिरोही तहसीलदार कोर्ट को भेजकर पुन: सुनवाई को कहा।

सिरोही तहसीलदार ने सुनवाई के बाद दिसंबर 2017 सरकार के पक्ष में फैसला दिया। फैसले के बाद तहसीलदार ने उक्त भूमि पर सरकारी भूमि होने का बोर्ड भी लगवा दिया।

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