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स्पेशल कोरेसपोंडेंट | जोधपुर

निलंबित डीएसओ को गिरफ्तारी से बचने का मौका दे रही एसीबी, 2 माह हो गए कोर्ट से रोक नहीं, अग्रिम जमानत अर्जी लगते ही...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 06:00 AM IST

निलंबित डीएसओ को गिरफ्तारी से बचने का मौका दे रही एसीबी, 2 माह हो गए कोर्ट से रोक नहीं, अग्रिम जमानत अर्जी लगते ही बंद हो गई दबिश


स्पेशल कोरेसपोंडेंट | जोधपुर

आईएएस निर्मला मीणा ने डीएसओ रहते हुए 8 करोड़ रुपए का 35 हजार क्विंटल गेहूं कालाबाजार में बेच दिया, इस आरोप का केस एसीबी में 2 माह पहले दर्ज हो चुका है। मीणा पंद्रह दिन से अंडरग्राउंड है और उनकी अग्रिम जमानत याचिका पर हाईकोर्ट में बहस जारी है। इधर, मामले का सह आरोपी स्वरूप सिंह 7 दिन के रिमांड पर है और वह कबूल कर चुका है कि 30 ट्रक तो उसने ही बेचे हैं, फिर भी एसीबी मीणा को गिरफ्तारी से बचने का पूरा मौका दे रही है। अग्रिम जमानत की अर्जी लगे पंद्रह दिन हो चुके हैं, हाईकोर्ट से उनकी गिरफ्तारी पर कोई रोक नहीं है परंतु दबिश बंद हो चुकी है, इस अवधि में एसीबी ने गिरफ्तारी के लिए कोई प्रयास नहीं किए। भास्कर ने जब एसीबी से पूछा तो तर्क दिया गया, कि वह नैसर्गिक न्याय (फेयर प्ले ऑफ जस्टिस) का इंतजार कर रही है। अग्रिम जमानत का विरोध कर रहे हैं, फिर भी मिल गई तो सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और उन्हें सरेंडर के लिए मजबूर करेंगे।

एसीबी-मीणा के ‘फेयर-प्ले’ के चार राउंड

डिफेंस की दलील बिना गिरफ्तारी पूछताछ कर ले एसीबी, जांच को तैयार है

तत्कालीन डीएसओ महावीर सिंह ने कोटा लैप्स करवा कर गेहूं सरेंडर कर दिया था, जबकि मीणा ने प्रयास कर वही गेहूं पुन: 35 हजार क्विंटल आवंटित कराया था। मीणा के पास तो अतिरिक्त चार्ज था, जबकि एसीबी ने महावीर सिंह को क्लीनचिट दे दी। मीणा ने परिवार भी नगर निगम के चार पत्रों पर बढ़ाए थे, वह अब भी जांच को तैयार है, गिरफ्तारी की जरूरत क्यों है? उन्हें टारगेट बनाया गया है।

सबूत खिलाफ एसडीएम को अधिकार थे, उन्होंने 18 परिवार ही जोड़े थे

छह बार डीएसओ रह चुकी मीणा के खिलाफ ही शिकायत थी, विभागीय जांच में भी घपला माना। निगम के जिन चार पत्रों का हवाला दिया, वे फर्जी थे। पोश मशीनें लगने के बाद नाम भेजने के पॉवर ही एसडीएम के पास थे। तत्कालीन एसडीएम आईएएस अधिकारी आलोक रंजन ने 5 दिसंबर 2015 से 4 जनवरी 2016 तक 18 नाम जोड़े व 84 खारिज किए थे, फिर मीणा ने 33 हजार परिवारों का आवंटन क्यों कराया।?

फेयर-प्ले का पर्दा ...क्योंकि जजा वर्ग की महिला आईएएस है

सीनियर आईएएस अशोक सिंघवी को गिरफ्तार करने वाली एसीबी मीणा के केस में ‘फेयर-प्ले’ क्यों चल रही है, इसके पीछे तीन कारण हैं। पहला आईएएस लॉबी, वही तो एसीबी अफसरों की पोस्टिंग करती है। दूसरा महिला अफसर और तीसरा जजा वर्ग। इसलिए एसीबी ने हाथ खींच रखे हैं। कोर्ट में विरोध तो कर रहे हैं, मगर यह भी चाहते हैं कि वे अदालत के फैसलों का आखिर तक इंतजार करेंगे।

जांच में साफ गबन | सरकार को प्रति किलो 18 रुपए का घाटा, डीएसओ को 10 का फायदा

स्वरूप सिंह ने 30 ट्रक गेहूं आटा मिलों को बेचना कबूला है। पांच जनों के नाम बताए जिन्हें गेहूं सप्लाई किया था। उसने बताया कि 2 रुपए में बिकने वाला गेहूं एफसीआई ने 20 रुपए की दर से खरीदा, डीएसओ ने उन्हें 12 रुपए में दिया। डीएसओ को प्रति किलो 10 व सप्लायर को 8 रुपए का फायदा हुआ, सरकार को 18 रुपए का घाटा उठाना पड़ा। ऐसे ही 35 हजार क्विंटल का हिसाब करोड़ों में हुआ था।

राशि बरामद करने के लिए मीणा का कस्टोडियल इंटेरोगेशन जरूरी

(एसीबी एसपी अजयपाल लांबा से सीधी बात)

Q. केस दर्ज हुए 2 माह हो गए, मीणा के खिलाफ के पुख्ता सबूत है या नहीं?

A. एक माह की जांच में यह प्रमाणित है कि गेहूं वितरण में करोड़ों का गबन हुआ है। इसमें तत्कालीन डीएसओ निर्मला मीणा के खिलाफ भी पुख्ता सबूत हैं।

Q. फिर गिरफ्तारी के लिए कितनी बार कहां-कहां दबिश दी?

A. 12 जनवरी को एसीबी कोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज हुई तब उनके ठिकानों पर लगातार दबिश दी जा रही थी। हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत अर्जी लगने के बाद ‘फेयर प्ले ऑफ जस्टिस’ के इंतजार में दबिशें बंद कर दी।

Q. तो कस्टोडियल इंटेरोगेशन चाहिए या नहीं?

A. पूरे षड़यंत्र का खुलासा करने और करोड़ों रुपए के सरकारी धन की जो लूट की है, उसकी बरामदगी के लिए आईएएस मीणा का कस्टोडियल इंटेरोगेशन जरूरी है।

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