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3 वर्ष पहले
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परम्परागत व्यवसायों के लिए ऑक्सीजन है टेक्नोलॉजी

इस रविवारको हमने घरभर के ऊनी कपड़े निकाले और उन्हें धूप दिखाई, क्योंकि अब धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगी है। इनमें मेरे घर में एक काला कंबल भी है, जो मेरे पिता बरसों तक इस्तेमाल करते रहे। उन्होंने मुझे सलाह दी थी कि इसे कभी धोना मत। बस धूप दिखा देना। ऐसे कंबल कम से कम महाराष्ट्र में अब भी किसानों के घरों में दिख जाते हैं।

मुझे यह कंबल कभी पसंद नहीं आया, क्योंकि बिना किसी डिजाइन वाला काला कंबल मुझे आकर्षित नहीं करता था। लेकिन, मेरे पिताजी किसी को भी उसे छूने तक नहीं देते थे। केवल एक बार नागपुर में 1970 पार के दशक में हम दोनों भाई-बहन बीमार पड़ गए और ठंड से कांप रहे थे तो उन्होंने यह कंबल हमें चारों ओर से ओढ़ा दिया था। फिर कई दिनों तक इस्तेमाल करने दिया, जब तक कि हम ठीक नहीं हो गए। रजाइयों की तुलना में मैं कभी उस ब्लैंकेट की गर्मी को भुला नहीं पाया। उसके बाद से जब भी कड़कड़ाती ठंड पड़ने लगती, हम भाई-बहनों में होड़ मच जाती कि कौन वह कंबल पहले लेता है।

बरसों बाद एक बार जब हम सोलापुर में हमारे अंकल के घर गए तो हमें 7 फीट लंबे कंबल को बनाने की प्रक्रिया जानने का मौका मिला, क्योंकि हमारे अंकल इसी का बिज़नेस करते थे। इस कंबल के लिए ऊन देशी ‘डेक्कनी भेड़’ से ली जाती थी, जिसके कारण उसका रंग काला होता था और छूने पर खुरदरा लगता था। आमतौर पर महिलाएं चरखे पर सूत बुनती थीं और फिर करघे पर कंबल बुना जाता था। डाई के रूप में घर में बना इमली के बीजों का पेस्ट और फेरस सल्फेट का इस्तेमाल होता था, जिससे कंबल को मजबूती, टिकाऊपन और धूल विरोधी खासियत मिलती थी। मेरे अंकल केडगांव से उन्हें खरीदते थे, जो कंबल बनाने वाले धनगर परिवारों का गांव था। इन कंबलों का यूनिक सेलिंग पॉइंट यह था कि इस्तेमाल के साथ-साथ यह मुलायम होते जाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि किसान, बंजारे और चरवाहे इसे पवित्र कंबल समझते थे और उसका इस्तेमाल सारे रस्मों-रिवाजों में होता था, वे मानते थे कि यह अच्छे रक्तसंचार में मददगार है। इन्हें ‘घोंघडी’ ब्लैंकेट कहते हैं।

मेरे अंकल का प्रिय गीत हमेशा से संत ज्ञानेश्वर का 13वीं सदी का अभंग होता था, जिसकी शुरुआत कुछ इस तरह होती ‘खंडोबा तुझी घोंगडी चांगली’ यानी ‘हे भगवान खंडोबा आपका कंबल बहुत ही सुंदर है। उन दिनों क्षेत्र में ऐसे 500 से 600 करघे थे, जिनसे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता था। एक कंबल बनाने में 10 दिन लगते थे। इन सब बातों की मन में जुगाली करते हुए मैंने इस प्रोडक्ट के वज़ूद को गूगल पर खंगाला तो मुझ धक्का लगा कि चूंकि बुनकरों ने एक तो नई टेक्नोलॉजी नहीं अपनाई और फिर अपनी प्रक्रिया में भी अधिकतम दोहन लायक सुधार नहीं किया, जिसके कारण धीरे-धीरे करघे बंद होने लगे। केडगांव में जहां 80 करघे हुआ करते थे, अब सिर्फ 20 बचे हैं।

इस मरते हुए व्यवसाय को पुनर्जीवित करने के लिए सोशल आंत्रप्रेन्योर के रूप में तीन मसीहा सामने आए हैं। चूंकि वे इसी जिले के हैं तो इस व्यवसाय की बारीकिया और अर्थशास्त्र अच्छी तरह समझते हैं। तुषार पाखरे (22), नीरज बोराटे (26) और मधुरा अविनाश (24) ने मिलकर ghongadi.com लॉन्च की है। इसी साल अगस्त में उन्होंने यह साइट शुरू की। नवंबर के शुरुआती 10 दिनों में 130 कंबल बिक चुके हैं और काम शुरू करने के बाद से बेचे गए कंबलों की संख्या 750 तक पहुंच गई है। आधुनिक टेक्नोलॉजी के माध्यम से इसे धीरे-धीरे पुनर्जीवित होने के लिए ऑक्सीजन मिल रही है।

फंडा यह है कि आधुनिकटेक्नोलॉजी परम्परागत व्यवसायों को पुनर्जीवित करने के लिए ऑक्सीजन है, जिनकी संख्या बहुत ज्यादा है।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंटगुरु

raghu@dbcorp.in



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